डेडलाइन से अनुशासन, अनुशासन से मुक्ति

डेडलाइन से अनुशासन, अनुशासन से मुक्ति

जिस दिन
तुम सच में परिपक्व हो जाओगे,
डेडलाइन
खुद गिर जाएगी।
काम होगा—
क्योंकि होना है।

पर जब तक
वह दिन नहीं आया,
डेडलाइन से
नफ़रत मत करो।
उसे अपनाओ।

डेडलाइन
दंड नहीं है—
आईना है।
वह बताती है:
अभी भीतर
स्पष्टता पूरी नहीं है।

ईमानदारी से कहो—
“अगर प्रेम होता,
तो आदेश की ज़रूरत नहीं पड़ती।”

डेडलाइन इसलिए है
क्योंकि
बिना उसके
हम टालते हैं,
भागते हैं,
सोते रहते हैं।

सोचो—
तुमने जो कुछ सीखा है,
अधिकांश
किसके कारण सीखा?
परीक्षा,
प्रोजेक्ट,
समय की सीमा।

डेडलाइन न होती
तो
तुम आधा भी
न कर पाते।

डेडलाइन को
अनुशासन में बदलो।
और समझो—
अनुशासन
डर से नहीं,
शिष्यभाव से जन्म लेता है।

शिष्य
सीखने को उत्सुक होता है।
वह पास रहता है—
ज्ञान के,
सत्य के।

जब तुम
डेडलाइन का सम्मान करते हो,
तुम
सीखने लगते हो।

और जब
सीखना
आनंद बन जाए,
डेडलाइन
बोझ नहीं रहती।

फिर एक दिन
डेडलाइन
खत्म नहीं होती—
अप्रासंगिक हो जाती है।

तुम
खुद के शिक्षक बन जाते हो।
डर से नहीं,
प्रेम से काम करते हो।

और वही
असल आज़ादी है।
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