नींद में चलता जीवन
कक्षा छठी में
तुमसे कहा गया—
पढ़ो,
ताकि घर वालों को
पड़ोस में गर्व मिल सके।
इनाम रखे गए—
खिलौने,
मुस्कानें,
तुलनाएँ।
फिर कक्षा दस आई—
अंकों का डर,
भविष्य का शोर।
कक्षा बारह—
और गहरी थकान,
और बड़ा भय।
तुम झुके,
तुम दौड़े,
तुमने रटा—
पर कभी नहीं पूछा
कि क्यों।
अब कहानी बदली नहीं,
बस संख्या बदल गई।
अंक से तनख़्वाह,
तनख़्वाह से पद,
पद से प्रोफ़ाइल।
लिंक्डइन की तालियाँ,
प्रमोशन की दौड़,
और अंत में
एक सुरक्षित सेवानिवृत्ति—
उसी थकी हुई पटकथा का
अंतिम दृश्य।
बताओ,
छठी का वह बच्चा
और आज का यह पेशेवर—
अलग क्या है?
वही दौड़,
वही डर,
वही उधार के सपने।
कपड़े बदले,
नाम बदले,
पहचान बदली—
पर भीतर
वही मशीन चलती रही।
तुम चले—
पर दिशा नहीं जानी।
तुमने अभिनय किया—
पर भूमिका नहीं चुनी।
तुम जीवित रहे—
पर जागे नहीं।
जीवन
नींद में तय होता रहा,
और तुम
हर सुबह
उसी कहानी को
फिर से दोहराते रहे
जो कभी तुम्हारी थी ही नहीं।
अब एक प्रश्न
धीरे से
दरवाज़ा खटखटाता है—
क्या तुम सच में
जी रहे हो?
या बस
आँखें खुली रखकर
नींद में
चल रहे हो?





