अपने भीतर की शरारत पकड़ना
अपने ही भीतर
रंगे हाथों पकड़ लेना—
इससे बड़ा मज़ा
और क्या होगा?
जब मन
बिना पूछे
कल्पनाओं में फिसलने लगे,
तभी उसे पकड़ो।
जब डर
धीरे से कंधे पर
हाथ रखे,
या असुरक्षा
कान में फुसफुसाए—
उसी क्षण
रोशनी जला दो।
ये सब
अँधेरे के जीव हैं,
ध्यान की एक किरण
पड़ते ही
सिकुड़ने लगते हैं।
ईर्ष्या,
चिंता,
बिखरे विचार—
इन्हें सुधारो मत,
बस देखो।
देखते ही
इनकी पकड़
ढीली पड़ जाती है।
देखना
पकड़ना है,
पकड़ना
उजागर करना है,
और उजागर होना
स्वतंत्रता की
पहली दस्तक है।
कोई रहस्यमय साधना नहीं,
कोई ऊँची तकनीक नहीं—
इतना सरल
कि बेचैन मन
निराश हो जाए।
हम बाहर
सब कुछ देख लेते हैं,
पर भीतर
नज़र डालने से
बचते रहते हैं।
भीतर देखने का अर्थ
और कुछ नहीं—
अपने विचार,
अपने आवेग,
अपने कर्म
जैसे हैं
वैसे देख लेना।
मन
कभी इधर बहता है,
कभी उधर टकराता है,
और हम
उस बेचैनी से
कभी पूछते ही नहीं—
तू है क्या?
लहरों की तरह
बाहरी दबाव
आते-जाते रहते हैं,
और मन
थककर
उलझ जाता है।
समझ
कल्पना से नहीं आती,
विश्वास से नहीं आती,
वह आती है
निरंतर निरीक्षण से।
अहंकार को देखना
उसे पिघलाना है।
और अहंकार के पिघलते ही
स्वयं
वापस मिलने लगता है।
जिस मन में स्वतंत्रता है,
वही जीवन के
साफ़ निर्णय ले सकता है।
मन जैसा है,
जीवन वैसा ही है।
इसलिए
खुद को पकड़ो,
खुद को देखो,
बिना थके,
बिना रुके।
यही
मुक्ति का
दरवाज़ा है।





