अपनी ही जेब से चोरी
हम चोरी तब पहचानते हैं
जब उँगलियाँ
किसी और की जेब में जाती हैं।
पर जब
मैं अपने ही सपनों को
चुपचाप गिरवी रख देता हूँ,
जब
मैं अपनी ऊँचाई से
खुद ही मुँह मोड़ लेता हूँ—
तब कोई शोर नहीं होता।
मैं खुद से झूठ बोलता हूँ,
फिर उसी झूठ को
सच की तरह
ओढ़ लेता हूँ।
दूसरों को धोखा
कुछ समय तक ही चलता है,
पर स्वयं से किया गया धोखा
पूरी उम्र
चल सकता है।
मैं अपने भीतर के घर को
खुद ही लूटता हूँ—
संभावनाएँ,
साहस,
ईमानदारी,
और फिर हैरान होता हूँ
कि खालीपन क्यों है।
समाज
दूसरों की चोरी पर
सज़ा देता है।
पर स्वयं से की गई चोरी पर
जीवन
खुद फैसला सुनाता है।
कोई अदालत नहीं,
कोई जज नहीं—
बस हर दिन
थोड़ा-थोड़ा
खोता हुआ
मैं।
सबसे गहरी चोरी
वह नहीं
जो अँधेरे में होती है,
सबसे गहरी चोरी
वह है
जो हम
अपने ही उजाले से
कर लेते हैं।





