न जुनून, न दबाव — बस प्रेम

न जुनून, न दबाव — बस प्रेम

न जुनून की चिंगारी,
न दबाव की बेड़ी,
काम वहाँ से जन्म लेता है
जहाँ प्रेम चुपचाप बैठा होता है।
हम कहते हैं—
“पैशन फॉलो करो,”
मानो जुनून कोई देवता हो,
और विवेक उसका पुजारी।
कोई बाज़ार के आगे झुकता है,
कोई परिवार के डर से,
और कोई अपने जुनून के नाम पर—
तीनों अलग दिखते हैं,
पर भीतर से लगभग एक-से हैं।
एक कहता है—
“मुझे यही करना है,
क्योंकि यही बिकता है।”
दूसरा कहता है—
“मुझे यही करना है,
क्योंकि यही मुझे अच्छा लगता है।”
फर्क?
बस इतना कि
एक ने भीड़ चुनी,
दूसरे ने अपना शोर।
पर कहीं बीच में
एक तीसरा रास्ता है—
जहाँ न तालियाँ मायने रखती हैं,
न तनख़्वाह की गिनती।
वहाँ आँखें खुली होती हैं,
और मन साफ़।
वहाँ दिखता है—
क्या ज़रूरी है,
क्या गायब है,
और क्या अगर न हुआ
तो जीवन अधूरा रह जाएगा।
यहाँ काम उत्साह से नहीं,
अपरिहार्यता से होता है।
यह इच्छा नहीं,
आह्वान है।
ऐसा बुलावा
जिससे भागना संभव नहीं।
यह “करियर” नहीं,
कर्तव्य है।
कोई मोटिवेशनल पोस्ट नहीं,
अंदर की बेचैनी है।
इसे टाला नहीं जाता,
इसे सजाया नहीं जाता,
इस पर सौदे नहीं होते।
आप यह नहीं पूछते—
“मुझे इसमें क्या मिलेगा?”
आप जानते हैं—
अगर यह नहीं किया,
तो आप स्वयं से गिर जाएँगे।
व्यंग्य यह है कि
दुनिया इसे भी
“पैशन” कह देगी,
और आप मुस्कुरा देंगे—
क्योंकि आप जानते हैं,
यह जुनून नहीं,
प्रेम है।
और प्रेम
कभी शोर नहीं करता,
बस करवाता है।
Scroll to Top