प्रेरणा क्यों विफल होती है

तुम्हें प्रेरणा नहीं चाहिए,
तुम्हें बोध चाहिए।
धक्का नहीं,
खींच नहीं—
भीतर की वह चाबी
जो पहले से तुम्हारे पास है।

प्रेरणा
हमेशा बाहर से आती है—
कोई भाषण देता है,
मन गरम हो जाता है।
कोई फ़िल्म देखी,
सीना भर आया।
किताब बंद हुई,
जोश भी बंद।

यह तुम्हारी ऊर्जा नहीं थी,
यह उधार थी।
और उधार की आग
ज्यादा देर नहीं जलती।

बाहरी शक्ति
तुम पर काम करती है,
तुम प्रतिक्रिया करते हो—
यह स्वतंत्रता नहीं,
यह स्पष्टता नहीं,
यह जीवन भी नहीं।

एक कहता है— इधर चलो।
दूसरा कहता है— उधर।
पिता, मीडिया, गुरु—
हर कोई
अपनी दिशा थमा देता है।

और तुम?
दस दिशाओं में
खींचे जाते हो,
एक भी
तुम्हारी नहीं।

इसे जीवन मत कहो—
यह छापों की गुलामी है।
यह भ्रम है
जो जुनून का मुखौटा लगाए है।

सच्चा कर्म
प्रेरणा से नहीं जन्मता।
वह
समझ से उपजता है,
दृष्टि से,
शांत बुद्धि की
अडिग शक्ति से।

बाहर की दुनिया
अधिक से अधिक
तुम्हें तुम्हारे पास
लौटा सकती है।
बस इतना ही।

और इतना पर्याप्त है—
क्योंकि
जब भीतर का स्रोत
छू लिया जाता है,
तो
न धक्का चाहिए,
न शोर।

असल ऊर्जा
हाइप नहीं होती।
वह
देखने से आती है।

और जब तुम
साफ़ देखते हो,
तो
ठीक करते हो—
बिना किसी के
उकसाए।

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