बाहरी ज्ञान, भीतरी अंधकार

Outer Knowledge, Inner Darkness
(बाहरी ज्ञान, भीतरी अंधकार)
(एक लम्बी, विचारप्रद, सत्यनिष्ठ अतुकांत कविता)

अठारह साल,
या पच्चीस साल—
तुमने पढ़ा क्या?

भाषाएँ,
इतिहास,
राजनीति,
भूगोल,
अर्थशास्त्र।

सूत्र, समीकरण,
मानचित्र, तिथियाँ—
जानकारियों की बाढ़।

पर एक असहज प्रश्न है—
क्या तुम
अंग्रेज़ी भाषा हो?
या फ्रेंच व्याकरण?

क्या तुम
रासायनिक समीकरण हो?
या त्रिकोणमिति का सिद्धांत?

क्या तुम
पाठ्यपुस्तक में छपी
नदियाँ और हिमनद हो?
क्या तुम
अलेक्ज़ेंडर हो,
या अशोक?

क्या तुम
हार्डवेयर हो?
या कोड?

स्पष्ट है—
जो कुछ भी तुमने पढ़ा,
वह सब
तुमसे बाहर था।

और यही
मुख्यधारा की शिक्षा देती है—
दुनिया की जानकारी,
वस्तुओं का ज्ञान।

पर तुम
कोई वस्तु नहीं हो।

तुम
वह हो
जो पढ़ता है,
सोचता है,
रोता है,
चुनता है,
तरसता है,
और पीड़ा झेलता है।

तुम
विषय हो,
विषय-वस्तु नहीं।

तो फिर
तुमने
खुद को क्यों नहीं पढ़ा?

क्या तुम्हारी शिक्षा ने
कभी तुम्हें
अपने केंद्र के पास पहुँचाया?

क्या उसने
तुम्हारे मन को
समझने में मदद की?

तुम्हारे
आसक्तियों को,
डर को,
पैटर्न्स को?

क्या उसने
कभी पूछा—
प्रेम क्या है?
मानसिक स्वतंत्रता क्या है?
सचेत होकर जीना
क्या होता है?
मैं कौन हूँ?

मैं तुमसे पूछता हूँ—
क्या अधिक महत्वपूर्ण है?
चारों ओर
चमकती वस्तुएँ,
या
तुम स्वयं?

आज
वस्तुएँ
स्मार्ट हैं,
चमकदार हैं,
अत्याधुनिक हैं—
और मनुष्य?

भटका हुआ,
उलझा हुआ,
हिंसक,
कुरूप।

एक शब्द खोजो—
Sixth Mass Extinction
और देखो
हमने क्या किया है।

हाथ में
सबसे उन्नत फोन है—
पर यदि वह
भीतर के शोर को
और तेज़ कर दे,
तो वह उपकरण है
या विष?

अंधे मन के हाथ में
तकनीक
औज़ार नहीं रहती,
हथियार बन जाती है।

हमने
मशीनों को
सोचना सिखा दिया—
पर खुद से
यह पूछना भूल गए
कि
क्या हम सोचते भी हैं?

हाँ,
हमने
वैज्ञानिक चमत्कार किए।

पर उनका उपयोग?

अधिक उत्पादन,
अधिक उपभोग,
अधिक जलाना,
अधिक ज़हर।

और इसे
हम
उपलब्धि कहते हैं।

यह सब
किसने संभव किया?

शिक्षा ने।

ऐसी शिक्षा
जो दुनिया के बारे में
सब कुछ जानती है,
पर
जानने वाले के बारे में
कुछ भी नहीं।

ऐसी शिक्षा
जो यह नहीं पूछती—
मनुष्य होना
क्या है?
ध्यान क्या है?
विचार की प्रकृति
क्या है?

यह शिक्षा नहीं,
यह प्रशिक्षण है।
प्रोग्रामिंग है।
कंडीशनिंग है।

सच्ची शिक्षा
तब शुरू होती है
जब छात्र को
मशीन नहीं,
जाग्रत होने वाला
प्राणी माना जाता है।

और मैं यह
फिर कहूँगा,
आख़िरी साँस तक कहूँगा—

अगर
तुम्हारी सारी
औपचारिक शिक्षा
एक तरफ रख दी जाए,
और
स्व-अध्ययन—
स्व की शिक्षा
दूसरी तरफ—

तो
स्व-अध्ययन
अनंत गुना अधिक मूल्यवान है।

क्योंकि
केवल वही
मुक्त कर सकता है।

और
मुक्ति—
यही
सीखने का
एकमात्र
वास्तविक उद्देश्य है।
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