बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना

बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना

याद रखो—
जिसे तुम देखते हो,
जिसे तुम पूजते हो,
जिसे तुम समय देते हो,
अंततः
तुम वही बन जाते हो।

यह दुनिया
बीमारी से अछूती नहीं है।
समाचार बीमार हैं,
बाज़ार बीमार हैं,
मनोरंजन बीमार है,
शिक्षा बीमार है,
सत्ता बीमार है।

यहाँ पीड़ा
अपवाद नहीं,
पृष्ठभूमि है—
हर दिन की
लगातार बजती आवाज़।

टीवी खोलो—
क्या दिखता है?
गहराई?
शांति?
बोध?

नहीं।
वही दौड़,
वही लालच,
वही असुरक्षा,
वही तुलना,
वही ईर्ष्या—
हज़ार रंगों में लिपटी
एक ही पागलपन,
जिसे
“सफलता” कहा जाता है।

यह घिनौना लग सकता है,
थकाने वाला भी।
पर यही यथार्थ है।

और ध्यान रखना—
बीमारी
शोर मचाकर नहीं आती,
धीरे-धीरे
अंदर उतरती है।
जो तुम्हारे ध्यान में रहता है,
वही
तुम्हारे अस्तित्व में घुस जाता है।

अब प्रश्न यह नहीं
कि दुनिया कैसी है—
प्रश्न यह है
कि तुम कैसे जीना चाहते हो।

क्या केवल इसलिए
शोर का हिस्सा बन जाना है
क्योंकि शोर हर ओर है?
क्या बाहर की गंदगी को
अंदर का शासन सौंप देना है?

यदि उत्तर “न” है,
तो जीवन का उद्देश्य
अचानक स्पष्ट हो जाता है—

बीमारी के बीच
स्वस्थ रहना।
भीड़ में रहकर भी
अछूता रहना।
अकेले पड़ने का जोखिम उठाकर
स्पष्ट रहना।

आवश्यक हो तो
इस स्वास्थ्य की रक्षा
अपने प्राणों की कीमत पर भी करना।

और फिर—
बिना प्रयास के,
बिना उपदेश के,
यह स्वास्थ्य
दूसरों तक पहुँचेगा।

क्योंकि
स्वस्थ व्यक्ति
प्रचार नहीं करता—
वह
प्रकाशित होता है।

यह न दान है,
न नैतिकता,
न कोई महान मिशन।

यह केवल
वह ऋण है
जो तुम्हें
अपने प्रति
चुकाना है।

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