असुरक्षा का परिवार
गपशप
सच का संवाद नहीं,
डर की साझेदारी है।
कुछ लोग बैठते हैं,
शब्द नहीं—
खालीपन बाँटते हैं।
और अचानक
भीड़ बन जाती है।
कौन जोड़ता है उन्हें?
न विचार,
न विवेक,
न सत्य—
बस
निरर्थकता की गर्माहट।
डर अकेले रहने का है,
इसलिए
शोर में घुल जाते हैं।
जो स्वयं से अनजान हैं,
वे
एक-दूसरे का सहारा बनते हैं।
वर्मा भी बोलता है,
शर्मा भी,
चोपड़ा भी—
सब वही।
तो मैं भी वही बोलूँ,
तो मैं भी अपना हूँ।
यह अपनापन
सच से नहीं बनता,
यह बनता है
झूठ की सहमति से।
निरर्थकता छोड़ते ही
दरवाज़ा बंद हो जाता है।
भीड़ छूटती है,
और
मन सामने आ जाता है—
नंगा,
अकेला,
ईमानदार।
यहीं चाहिए साहस—
बिना समूह के खड़े होने का,
बिना शोर के जीने का,
बिना तालियों के
स्वतंत्र रहने का।
पर अधिकतर
यह जोखिम नहीं उठाते।
वे रहते हैं
शोर में,
तुच्छता में,
झूठे रिश्तों की
गर्म चादर ओढ़े।
इसीलिए
निरर्थकता का परिवार
इतना बड़ा है—
और
स्वतंत्र मन
इतना अकेला।





