भय कभी भय बनकर नहीं आता

भय कभी भय बनकर नहीं आता

तुम सोचते हो
दुनिया बाँध रही है तुम्हें।
पर सच यह है—
डोरियाँ तुम्हारे भीतर हैं।

भय कभी
भय बनकर नहीं आता।
वह प्रेम का मुखौटा पहनता है,
कर्तव्य कहलाता है,
ज़िम्मेदारी बन जाता है,
पर भीतर से
काँपता रहता है।

भय है जब कहा जाता है—
शादी कर लो,
बुढ़ापे में अकेले रह जाओगे।
तुम साथ नहीं खोजते,
तुम बीमा खरीदते हो।

भय है जब
नापसंद नौकरी स्वीकार कर लेते हो,
क्योंकि उसका नाम
सम्मानजनक लगता है।

भय है जब
जीवन बीमा लेते हो
समझ से नहीं,
डर graphical चेतावनी से।

भय है जब
प्रेम को शादी का प्रमाणपत्र चाहिए,
और भय ही है
जब जाति आड़े आ जाती है।

भय है जब
परंपरा मानी जाती है,
बुद्धि से नहीं,
डर से।

देखो—
भय कितना चालाक है।
वह कभी चिल्लाता नहीं।
वह संस्कृति बन जाता है।

तुम उसका अनुसरण करते हो,
कमज़ोरी से नहीं,
जाँच न करने से।

अंदर कुछ खटकता है,
पर तुम उसे
समझौता कह देते हो,
परिपक्वता कह देते हो।

वही खटकन
पवित्र संकेत है।
सत्य की धीमी फुसफुसाहट।

ध्यान दो।
प्रतिक्रिया नहीं।
तर्क नहीं।
केवल ध्यान।

तभी दिखेगा—
भय और लालच
कब से सिंहासन पर बैठे हैं।

परिवार, धर्म, सरकार
तब तक शक्तिशाली नहीं,
जब तक तुम्हारा भय
उनसे हाथ नहीं मिलाता।

भीतर का भय
आदेश नहीं देता।
वह मुस्कुराता है।
सुरक्षा का वादा करता है।

उसका नाम लो।
उसे उजागर करो।
उसके आगे मत झुको।

क्योंकि क्रांति
सड़क से नहीं,
आईने से शुरू होती है।
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