मुक्त समय का मिथक

मुक्त समय का मिथक

जीवन को
खालीपन नहीं चाहिए,
उद्देश्य चाहिए,
आग चाहिए।

समय को बरबाद करने का
सबसे आसान तरीका है—
छोटी-छोटी बातों में
मन को उलझाए रखना,
सोचना,
घिसटना,
और वहीं फँसे रहना।

जीवन ही समय है।
हर क्षण
अमूल्य है।

हम जन्म लेते हैं
शारीरिक प्रवृत्तियों की बेड़ियों में,
और बड़े होते-होते
समाज से
और भी जंजीरें जमा कर लेते हैं।

जीवन का अर्थ है—
सीख को भी छोड़ना,
खुद को माँजना,
और जितना हो सके
मुक्त होना।

एक विशाल वृक्ष की तरह
हर दिशा में फैलो—
उन सीमाओं को तुच्छ समझते हुए
जो तुम्हें बाँधना चाहती हैं।

समय को
बस गुजरने मत दो।
पल को
कॉलर से पकड़ो,
और उसका पूरा मूल्य निचोड़ लो।

जिसे तुम
“फ्री टाइम” कहते हो,
वह अक्सर
कैद का समय होता है।

काम निपटा कर
सोफ़े पर ढह जाना,
रिमोट ढूँढना—
यह स्वतंत्रता नहीं,
यह सुस्ती की गुलामी है।

“मुक्त”
कोई हल्का शब्द नहीं।
पूछो—
मुक्त किससे?

सच्ची स्वतंत्रता
भीतरी बंधनों से मुक्ति है।

तो मुक्त समय क्या है?
वह समय
जो मुक्ति की खोज में लगे।
बाकी सब
विषाक्त विश्राम है।

ज़्यादातर मूर्खताएँ
इसी तथाकथित
फ्री टाइम में जन्म लेती हैं।

समय को खर्च करो
उस सर्वोच्च के लिए
जो जीवन दे सकता है।

यही सच्चा कर्म है—
केवल रोज़ी नहीं,
केवल करियर नहीं।

जीवन छोटा है।
पवित्र कार्य करना है।
एक मुक्त स्थान तक पहुँचना है।

जब तुम्हारा कर्म
स्वतंत्रता के प्रेम से भरा हो,
सत्य से उजला हो,
और पूरी निष्ठा से किया गया हो—
तभी कहो:
यह मेरा मुक्त समय है।

मुक्त समय
काम से भागना नहीं।
मुक्त समय
वह है
जब तुम
स्वतंत्रता के प्रेम में
सबसे कठिन कर्म करते हो।
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