लक्ष्मण रेखा के उस पार
(अतुकांत कविता)
एक समय था—
गलत काम
अँधेरे में होते थे,
पर अँधेरा ही
शर्म का सबूत था।
छिपना
इस बात की गवाही देता था
कि कहीं न कहीं
अभी नैतिकता ज़िंदा है,
अभी आत्मा
पूरी तरह मरी नहीं है।
तब समाज
गलत को गलत कहने का
साहस तो रखता था,
और अपराधी
नज़र झुकाकर चलता था।
अब—
गलत काम
खुले मंच पर हैं,
तालियों के बीच,
कैमरों की रोशनी में।
अब छिपने की ज़रूरत नहीं,
क्योंकि
लज्जा आउटडेटेड हो चुकी है,
और विवेक
हाशिये पर डाल दिया गया है।
जब पाप
गर्व से चलता है,
और नीति
माफी माँगती है,
तब समझ लो—
लक्ष्मण रेखा
केवल मिटाई नहीं गई,
उसे पैरों तले
रौंद दिया गया है।
यह पतन
किसी एक व्यक्ति का नहीं,
यह उस समाज का है
जो चुप रहकर
गलत का साझेदार बन गया।
अगर अब भी
आवाज़ नहीं उठी,
तो आने वाली पीढ़ियाँ
इतिहास नहीं पढ़ेंगी—
वे सिर्फ
हमारी कायरता
का परिणाम जिएँगी।
अब सवाल यह नहीं
कि गिरावट होगी या नहीं,
सवाल यह है—
क्या कोई
लक्ष्मण रेखा
दोबारा खींचने का
साहस करेगा?





