समय नहीं उड़ता, तुम बह जाते हो
समय
कहीं भागता नहीं।
वह
तुम्हारे पीछे-पीछे
चलता है।
जैसा तुम मूल्य देते हो,
वैसा ही
समय बँटता है।
हर क्षण
तुम स्वयं तय करते हो—
ध्यान कहाँ जाएगा,
ऊर्जा किसे मिलेगी,
जीवन किस दिशा में
ढलेगा।
भटकाव,
कर्तव्य,
इच्छाएँ—
सब
तुम्हारी प्राथमिकताओं के
अनुवाद हैं।
समय
कोई रहस्य नहीं।
वह
एक दर्पण है—
जो दिखाता है
कि तुम्हारे भीतर
वास्तव में
महत्त्वपूर्ण क्या है।
इसलिए जब तुम कहते हो—
“पता ही नहीं चला,
समय कहाँ चला गया”—
तो यह
मासूमियत नहीं होती।
यह
ईमानदारी की कमी होती है।
समय
फिसलता नहीं।
वह
ठीक वहीं जाता है
जहाँ
तुम्हारा मन
उसे भेजता है।
और यदि तुम कहते हो—
“मैं तो अनजाने में
भटक गया”—
तो
समझ लो—
उस क्षण
अचेतनता
तुम्हारा चुना हुआ मूल्य थी।
जैसे स्पष्टता
एक चुनाव है,
वैसे ही
अस्पष्टता भी।
और
यह चुनाव
सस्ता नहीं पड़ता।
जिस दिन
तुम्हें यह साफ़ दिखने लगे
कि क्या आवश्यक है—
उस दिन
समय
उस स्पष्टता की
आज्ञा मानने लगता है।
फिर
न बहाव रहता है,
न शिकायत।
न यह एहसास कि
ज़िंदगी
हाथ से निकल रही है।
समय
तब
तुम्हारे उद्देश्य की ओर
दौड़ता है।
इसलिए
स्पष्टता के लिए जियो।
क्योंकि
उसके बिना
जीवन
तुम्हारी ही
दुविधाओं की
दरारों से
चुपचाप
रिसता रहता है।
और एक दिन
तुम देखोगे—
समय नहीं गया था।
तुम
कहीं
ठहरे ही नहीं थे।





