सही कर्म का आनंद

सही कर्म का आनंद

सही विकल्प चुनो,
सही निर्णय लो,
सही युद्ध लड़ो—
अब
जीत-हार
महत्वहीन है।

क्योंकि
जहाँ तुम्हें खड़ा होना था,
तुम
वहीं खड़े हो।

विजय
बाहर की ट्रॉफी नहीं,
वह
भीतर की स्पष्टता है—
अपने सबसे सचेत
स्वरूप से
मेल।

जब निर्णय स्वच्छ हो,
जब चयन
अंदर से न्यायपूर्ण हो,
तो परिणाम
केंद्र में नहीं रहता।

महत्व बस इतना है—
तुमने
पीठ नहीं फेरी।

पूरी ताक़त से
जो क्षण माँगे,
उसे दो।
कुछ बचाकर मत रखो।

तब
न पछतावा रहेगा,
न शोक।
बस
सही कर्म का
आनंद।

रोना
उनका काम है
जो टालते हैं,
समझौते करते हैं,
ग़ायब रहते हैं।

वे बाद में
इसलिए टूटते हैं
क्योंकि
वक़्त पर
पूरा उपस्थित नहीं थे।

अगर तुम
सच में
अपना कर्तव्य निभा रहे हो,
तो वह
तुम्हें पूरा खपा देगा—
आख़िरी साँस तक।

फिर
अफ़सोस के लिए
कोई ऊर्जा नहीं बचेगी।

और अगर
अब भी
मन रोता है,
तो ईमानदार रहो—
कहीं न कहीं
कुछ बचा लिया गया था।

प्रतिबद्धता यही है—
सिर्फ़ सही युद्ध लड़ना नहीं,
बल्कि
उसमें इतना उतर जाना
कि
हार भी
ध्यान भटका न सके।

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