हिंदी संग्रह कविता-एकता अमर रहे

एकता अमर रहे

कविता संग्रह
कविता संग्रह


देश है अधीर रे!
अंग-अंग पीर रे!
वक्त की पुकार पर,
उठ जवान वीर रे!
दिग्-दिगंत स्वर रहे!
एकता अमर रहे!!
एकता अमर रहे !!


गृह-कलह से क्षीण आज देश का विकास है,
कशमकश में शक्ति का सदैव दुरुपयोग है।
हैं अनेक दृष्टिकोण, लिप्त स्वार्थ-साध में,
व्यंग्य-बाण-पद्धति का हो रहा प्रयोग है।
देश की महानता,
श्रेष्ठता, प्रधानता,
प्रश्न है समक्ष आज,
कौन, कितनी जानता?
सूत्र सब बिखर रहे!
एकता अमर रहे!!
एकता अमर रहे!!


राष्ट्र की विचारवान शक्तियाँ सचेत हों,
है प्रत्येक पग अनीति एकता प्रयास में।

तोड़-फोड़, जोड़-तोड़ युक्त कामना प्रवीण,
सिद्धि प्राप्त कर रही है धर्म के लिबास में।
बन न जाएँ धूलि कण,
स्वत्व के प्रदीप्त-प्रण,
यह विभक्ति-भावना,
दे न जाए और व्रण,
चेतना प्रखर रहे!
एकता अमर रहे!!
एकता अमर रहे!!


संगठित प्रयाण से देश कीर्तिमान हो,
आँच तक न आ सकेगी, इस धरा महान को।
हैं मित्रता की आड़ में,
कर न पाएँगे अशक्त देश के विधान को।
शत्रु जो छिपे
पन्थ हो न संकरा,
यह महान उर्वरा,
इसलिए उठो, बढ़ो!
जगमगाएँगे धरा,
हम सचेत गर रहे!
एकता अमर रहे!!
एकता अमर रहे!!

ज्योति के समान शस्य-श्यामला चमक उठे,
और लौ से पुष्प-प्राण-कीर्ति की गमक उठे।
यत्न हों सदैव ही रख यथार्थ सामने,
धर्मशील भाव से नित्य नव दमक उठे।

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