नान्हें कहिनी- टुरी खोजइ

नान्हें कहिनी- टुरी खोजइ

“बड़े बिहनिया जाड़ बतास के दिन म कहां जावत हो जी? हाड़ा गोड़ा ठंडा परत हे इहा।” मंगलू किहिस।

            “टुरी खोजइ चलत हे कका।चल ना आज कहूं डाहर तही ह लेग।” समारू कहिस।

मंगलू कथे चल ना त लेगत हँव। अइसे कहिके समारू अउ मंगलू ह बुधारू ल धर के टुरी खोजे बर निकल गे। 

            एक ठन गांव मा पहुंचिन । त उंहा एक जगा दुकान कर सियान बइठे राहय तेला मंगलू ह पूछिस ” कइसे बबा , इँहा बिहदरा टुरी मिलही का ? सियान कथे “हावय जी फेर कइसन ढंग के खोजत हव ते? ” हमन किसनहा खेती कमइया खोजत हँन बबा।” समारू किहिस। 

            अतिक बात ल सुन के सियान कथे ” फेर तो हमर गाँव म टुरी मिलना मुश्कुल हे सगा। काबर के आज के स्थिति परिस्थिति ल देखथों ते टुरी मन पढ़ लिख के बइठे बइठे हे। अउ आजकल के टुरा मन खाली पीली होगे हे।उँखर पढइ लिखइ ह पिछड़ गेहे। क्षमा चाहत हँव सगा तुँहर लइक टुरी मिलना मोला नी ममहात हे।”

           सियान के बात ल सुन के समारू मंगलू ह बुधारू ल कथे ” देखे रे बाबु! बने पढ़ लिख केहेंन रे। नइ मानेस ,खाली मोबाइल अउ घूमइ फिरइ। आज देखत हस निही। पढ़े लिखे के चक्कर मा टुरी घलक नइ मिलत हे। बने पढ़े लिखे रतेस त आज अइसन दिन देखे बर नइ मिलतिस । अब ले तिही देख बर बिहाव करे बर अउ टुरी खोजे बर सोचेंल ल लागत हे।”

बुधारू अपन मुँहु करे चुपेचुप मुस्कुरात राहय।

तोषण चुरेन्द्र ‘दिनकर’ 

धनगाँव डौंडी लोहारा 

बालोद छत्तीसगढ़

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