गुरु नानक देव — मनीभाई नवरत्न

गुरु नानक देव — मनीभाई नवरत्न

भारत की पुण्य धरती पर
जब मनुष्य भेद–भाव के अंधकार में बँटा हुआ था,
जब धर्म का सार
अनुष्ठानों की भीड़ में खो रहा था—
तब एक शांत प्रकाश उभरा,
जिसने कहा—
“ईश्वर एक है, और वह हर हृदय में विद्यमान है।”
वही प्रकाश थे—
गुरु नानक देव।

1469 ईस्वी, कार्तिक पूर्णिमा—
तलवंडी की मिट्टी
एक दिव्य बालक से सुगंधित हुई।
आज वही स्थान ननकाना साहिब कहलाता है,
जहाँ हर वर्ष
असंख्य श्रद्धालु
उनकी स्मृति में नतमस्तक होते हैं।
कालचंद और त्रिप्ता के आँगन में
जन्मा यह बालक
बहन नानकी के प्रेम से
“नानक” कहलाया—
और यह नाम
एक युग की पहचान बन गया।

बचपन से ही
नानक का मन
दुनियादारी में नहीं लगा।
किताबों से अधिक
उनकी रुचि थी
साधुओं की संगत में,
विचारों की गहराई में,
ईश्वर की स्मृति में।
खेतों के काम हों
या व्यापार का प्रयास—
उनका हृदय
हर जीव को अपने जैसा मानता था,
इसलिए लाभ–हानि
के बंधन उन्हें छू न सके।

पचास रुपये लेकर
लाभ कमाने भेजे गए,
पर उन्होंने
भूखे साधुओं को भोजन कराकर
“सच्चा सौदा” कर दिया।
और संसार ने जाना—
नानक लाभ के नहीं,
मानवता के मार्ग पर चले हैं।

नानक का व्यक्तित्व
शांत सरोवर जैसा था—
जिसमें उतरने वाला
अपनी अशांति छोड़ देता था।
मरदाना जैसे सरल हृदय
उनके भजन में खो गए।
उनका हर शब्द
मनुष्यता की परतें खोलता था—
जाति, धर्म, अवसर, सीमा
सबके परे,
एक ही सत्य की ओर संकेत करता था।

नानक घर से निकले—
तो फिर लौटे नहीं,
बल्कि पूरे संसार को
अपना घर बना लिया।
भारत की भूमि,
कश्मीर के पर्वत,
बंगाल की नदियाँ,
दक्षिण की तीर्थभूमियाँ,
यहाँ तक कि मक्का-मदीना—
हर स्थान पर
उन्होंने एक ही वचन कहा—
“ईश्वर सबमें है,
उसका कोई एक दिशा–कोण नहीं।”

जब काजी ने पूछा
काबा की ओर पैर क्यों किए,
तो नानक ने शांत स्वर में कहा—
“मेरे पैर उधर कर दो
जिधर ईश्वर न हो।”

और एक क्षण में
सबकी आँखें खुल गईं—
भेद मिट गया।

उनकी यात्राएँ
केवल कदमों की दूरी नहीं,
विचारों की मुक्ति थीं।

जीवन के अंतिम वर्षों में
कرتारपुर उनकी तपस्थली बना—
जहाँ वे किसानों के बीच रहे,
कीर्तन किया,
सत्संग रचा,
और प्रेम बाँटते रहे।
सत्तर वर्ष की आयु में
जब उनका शरीर शांत हुआ,
तो दोनों समुदाय—
हिंदू और मुसलमान—
उन्हें अपनी परंपराओं से विदा देना चाहते थे।
पर नानक तो वही थे
जो भेदों को मिटाने आए थे—
और इस क्षण में भी
उनकी शिक्षा जीवित रही।

गुरु नानक ने कहा—
ईश्वर एक है,
वह नाम है,
वह सत्य है।

माला की गिनतियाँ,
तीर्थ–यात्राएँ,
रोज़ा, नमाज़—
इनसे अधिक महत्वपूर्ण है
सत्य का आचरण,
अहिंसा का संकल्प,
ईमानदारी का जीवन।

उन्होंने जाति की दीवारें गिराईं,
मनुष्यता का मार्ग दिखाया,
और कहा—
“जो भीतर झाँकता है
वही ईश्वर को पाता है।”

आज भी
गुरु नानक का प्रकाश
हर कदम पर याद दिलाता है—
धर्म विभाजन नहीं,
एकता का दीप है।
और यह दीप
अनंत तक जलता रहेगा।

— मनीभाई नवरत्न

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