खुद से प्यार
सच
कोई मुलायम तकिया नहीं होता,
वह काँटा है—
जो भीतर धँसकर
हमें जगाता है।
दुनिया को बोलने दो।
वे मेरे कपड़ों पर बोलेंगे,
मेरी त्वचा पर,
मेरी आवाज़ पर।
ये सतह की बातें हैं—
हवा की तरह आती-जाती।
पर जहाँ मेरी असली कीमत रहती है,
वहाँ किसी का प्रवेश नहीं।
न भीड़ का,
न अपनों का।
वह जगह पवित्र है,
और उसकी रखवाली
मुझे खुद करनी है।
खुद से प्यार
आईने में मुस्कुराना नहीं है,
खुद को थपथपाना नहीं है।
खुद से प्यार
खुद से सवाल करना है—
कठोर,
ईमानदार,
बिना रियायत।
मैं अपना वकील नहीं,
अपना परीक्षक बनता हूँ।
तारीफ आए तो
मैं फूलता नहीं,
आलोचना आए तो
मैं टूटता नहीं।
दोनों ही
क्षणिक हैं—
कुछ अधूरा डेटा,
जो शायद काम आए,
या शायद नहीं।
मैं अपनी पहचान
उनकी हिलती रस्सियों पर
नहीं टाँगता।
मैं उसे
अपनी जागरूकता में टिकाता हूँ।
यही प्रेम है—
न नरमी,
न मीठा भ्रम,
बल्कि
साफ़ देखना,
बार-बार देखना,
और सच के सामने
खुद को खुला छोड़ देना।
आह!
खुद को जानने की
यह कठोर रोशनी—
यही
सबसे गहरी
और सबसे आज़ाद
खुशी है।





