सबसे ख़तरनाक घाव

सबसे ख़तरनाक घाव

कोई भी
जानबूझकर
खुद को नहीं तोड़ता।
हम जो भी करते हैं,
राहत के नाम पर करते हैं,
खुशी के भ्रम में,
भागने की चाह में।

हम कहते हैं—
यह प्रेम है,
यह स्वतंत्रता है,
यह उपचार है।
पर अज्ञान
नए नाम पहन लेता है।

खुद को चोट पहुँचाना
केवल दवाइयों या धारदार चीज़ों से नहीं होता।
यह तब भी होता है
जब हम ज़हर को
आत्मा का साथी समझ लेते हैं।

यह तब होता है
जब डर को
सुरक्षा कहकर
हम एक मरे हुए काम से चिपके रहते हैं।

यह तब होता है
जब हम खाते रहते हैं,
स्क्रॉल करते रहते हैं,
गपशप में डूबे रहते हैं,
आज्ञा मानते रहते हैं—
और सोचते हैं
कि अब हम पूरे हो जाएँगे।

स्व-हानि
वह क्षण है
जब गलत निर्णय
सही लगने लगता है।
जब आदतों से उपजा कर्म
स्वतंत्र इच्छा कहलाता है।
जब आवेग
अंतर्ज्ञान का मुखौटा पहन लेता है।

प्राचीनों ने इसे
अविद्या कहा—
न देख पाना,
न पूछ पाना,
न जान पाना
कि मैं कौन हूँ।

सबसे गहरी चोट
एक घटना नहीं होती।
वह एक जीवन होती है
जो बेहोशी में जिया जाता है।

एक मन
जो प्रश्न करने से इंकार कर देता है।
एक अस्तित्व
जो कभी नहीं पूछता—
मैं किसका जीवन जी रहा हूँ?

शर्तबद्ध अहंकार बनकर जीना
खुद पर की गई
सबसे बड़ी हिंसा है।

और त्रासदी यह है—
हम इसे
सामान्य कहते हैं,
सफलता कहते हैं,
यहाँ तक कि
प्रेम भी कह देते हैं।
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