पीड़ित होने का खेल

पीड़ित होने का खेल

अहंकार
दो भाषाएँ जानता है—
अच्छा हुआ तो
“मैंने किया”,
बुरा हुआ तो
“मेरे साथ हुआ।”

सफलता
उसकी पहचान बन जाए,
ऐसा कम ही होता है,
इसलिए वह
दोष को ही
अपनी ढाल बना लेता है।

हर चोट के पीछे
कोई और होता है—
आज वह,
कल यह,
और हर बार
मैं पीड़ित।

दया
उसकी प्रिय मुद्रा है,
क्योंकि दया में
बदलाव की माँग नहीं होती।

समाधान
कठिन है,
उसमें स्वयं को देखना पड़ता है।
इसलिए वह
स्पष्टता नहीं,
नियंत्रण चाहता है।

वह जिम्मेदारी
अपने पास नहीं रखता,
उसे उछाल देता है
दूसरों की ओर।

आत्मनिरीक्षण से बचकर
वह जीवित रहता है,
और हर बार
अपने ही कारागार
को सजाता रहता है।

उसे मुक्त होना नहीं,
सही ठहराया जाना चाहिए।
उसे बदलना नहीं,
सहानुभूति चाहिए।

और इस तरह
पीड़ित होने का यह खेल
अहंकार को बचा लेता है—
पर मनुष्य को
स्वतंत्र नहीं होने देता।
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