तुमने ही चोर को बुलाया
पहले इच्छा ने दरवाज़ा खोला,
फिर चोर भीतर आया।
जब चाह आग बन जाती है,
तो दुनिया
व्यापारी बनकर पहुँचती है—
मदद के लिए नहीं,
मुनाफ़े के लिए।
ज़रूरतमंद ग्राहक
सबसे आसान शिकार होता है।
अधीर हो तुम,
तो वादा कुछ भी चलेगा,
और मिलेगा—कुछ नहीं।
तुमने सुकून माँगा,
तुम्हें शोर मिला।
तुमने अर्थ चाहा,
तुम्हें नक़ली जवाब मिले।
फिर तुम बोले—
“उन्होंने मुझे ठग लिया।”
नहीं।
तुमने खुद को उजागर किया।
वे बस उस दरवाज़े से आए
जो तुमने खुला छोड़ा था।
भीतर एक खालीपन था।
उसे देखने की जगह
तुमने पुकारा।
दुनिया ने सुना—
और नक़ली समाधान बेच दिए।
जितनी बेचैनी,
उतनी गहरी गिरावट।
जिस दिन चाह थमी,
खेल बदल गया।
अब तुम पूछ सकते हो,
रुक सकते हो,
परख सकते हो।
अब तुम खरीदार नहीं,
सचेत दृष्टा हो।
और यही
बाज़ार की सबसे बड़ी हार है।
दुनिया
सिर्फ़ उसी को ठगती है
जो खुद को नहीं देखता।
अपनी भूख को देखो—
गिद्ध कमज़ोर हो जाएँगे।
अगर छल नहीं चाहते,
तो ज़रूरतमंद मत बनो।
अगर झूठ नहीं खरीदना,
तो आराम की भीख मत माँगो।
तुम असहाय नहीं हो।
स्पष्टता एक ही क्रिया से शुरू होती है—
दरवाज़ा बंद करो।





