विचलन नहीं जीतते, कमजोर लक्ष्य हारते हैं
यदि लक्ष्य
तुम्हें पकड़ नहीं पाता,
तो दुनिया
तुम्हें खींच लेती है।
विचलन दोषी नहीं हैं।
वे बस यह बता रहे हैं
कि लक्ष्य
निर्जीव है।
अगर बार-बार
ध्यान की याद दिलानी पड़े,
तो समझ लो—
हृदय वहाँ नहीं है।
कमजोर लक्ष्य
मन को भटकने का
निमंत्रण देता है।
यह समस्या नहीं,
लक्षण है।
ऐसा लक्ष्य चुनो
जो तुम्हारी ढाल बन जाए।
तुम उसकी रक्षा नहीं करते—
वह तुम्हारी करता है।
योग्य लक्ष्य
अनुशासन नहीं माँगता।
वह साँस बन जाता है,
गति बन जाता है,
संगीत बन जाता है।
उसकी उपस्थिति में
विचलन फीके पड़ जाते हैं—
बचपने जैसे,
अर्थहीन।
अधिकांश लक्ष्य
अपने नहीं होते।
वे विरासत में मिले होते हैं—
परिवार, समाज,
मीडिया की दी हुई जंजीरें।
इसलिए मन भागता है,
और तुम
खुद को दोष देते हो।
गलती इच्छा-शक्ति की नहीं,
नकली लक्ष्य की है।
जहाँ प्रेम है,
वहाँ एकाग्रता
अपने आप घटती है।
प्रेम में
रुकने की कोशिश नहीं करनी पड़ती।
जो कर्म
तुम्हारे स्वभाव से बहता है,
वह काम नहीं,
ध्यान है।
इच्छा थकाती है,
क्योंकि वह
कहीं और पहुँचना चाहती है।
प्रेम
यहीं पर्याप्त है।
वही पुरस्कार है।
दुनिया
तुम्हें चुराती नहीं।
तुम खुद को छोड़ते हो
जब उसे चुनते हो
जिससे प्रेम नहीं।
विचलन से मत लड़ो।
एकाग्रता सुधारने की योजना मत बनाओ।
प्रेम को चुनो।
लक्ष्य को प्रेम बनने दो।
प्रेम
विलय में हँसता है—
न विचलन से डरता है,
न एकाग्रता का बोझ उठाता है।





