इच्छा को मारो मत, शुद्ध करो

इच्छा को मारो मत, शुद्ध करो

इच्छा अपराध नहीं है।
आकर्षण पतन नहीं है।
गलती चाहने में नहीं,
गलती उस दिशा में है
जहाँ तुम चाह रहे हो।

इच्छा आग है—
उसी आग से
दीपक जलता है,
उसी से घर भी जलते हैं।

समस्या यह नहीं
कि तुम दौड़ते हो,
समस्या यह है
कि तुम किसके पीछे दौड़ते हो।

तुम मृगमरीचिका से
प्यास बुझाना चाहते हो,
छाया को पकड़कर
सहारा खोजते हो,
और फिर कहते हो—
जीवन खाली क्यों है?

इच्छा को मार देना
संन्यास नहीं,
आत्महत्या है।

इच्छा साधन है—
यदि चाह न होती
तो प्रेम कैसे होता?
यदि आकर्षण न होता
तो यात्रा कैसे शुरू होती?

पर जब वही इच्छा
सस्ती तालियों,
नश्वर देह,
और उधार पहचान से
चिपक जाती है—
वह पवित्र नहीं रहती।

चाहो—
पर सत्य को।
जुड़ो—
पर मुक्त करने वाले से।
लिप्त हो—
पर उस आग में
जो झूठ को जला दे।

समस्या आसक्ति नहीं,
अयोग्य आसक्ति है।

इतना तेज चाहो
कि झूठ टिक न पाए।
इतना गहराई से जुड़ो
कि अहंकार टूट जाए।

स्वतंत्रता
सुन्न हो जाना नहीं है।
स्वतंत्रता है—
सही तरह से जलना।

इच्छा को बुझाओ मत—
उसे इतना शुद्ध करो
कि वही
तुम्हारी मुक्ति बन जाए।
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