असंभव ही निमंत्रण है
जब करने योग्य में
पूरा डूबे हो,
तो
निराशा के लिए
जगह कहाँ बचती है?
अगर हर रेशा
इस क्षण की माँग में
लगा है,
तो
दुख रचने का
समय किसे है?
स्थिति जितनी
भारी होती है,
उतनी ही
नाटकीयता की
गुंजाइश
घट जाती है।
जब शत्रु
दो हज़ार गुना हों,
तो क्या
कोने में बैठकर
रोने की
फुर्सत मिलती है?
कुचली हुई परिस्थिति
शोक का निमंत्रण नहीं—
वह
कर्म का आदेश है।
उसकी तीव्रता
तुम्हें
पूरा उपस्थित
होने को मजबूर करती है—
ध्यान,
ऊर्जा,
संपूर्ण अस्तित्व।
अहंकार के
छोटे नाटक
वहीं
ढह जाते हैं।
सही चुनो,
और
पूरे उतर जाओ—
परिणाम से नहीं,
संलग्नता से
आनंद उपजता है।
यह आनंद
आराम का नहीं,
स्पष्टता का है।
अपने उत्तरदायित्व
साफ़ जानो—
आत्म-बोध
लापरवाही को
असंभव बना देता है।
दुख
घटना से नहीं,
कर्तव्य-त्याग से
जन्म लेता है।
निराशा
बाहर की देन नहीं—
वह
भीतर की
अनुपस्थिति का
चिह्न है।





