डूबना या खो जाना (अतुकांत कविता)
जब सार्थक में डूबते हो,
तो फालतू बातें
दरवाज़े पर दस्तक देती हैं,
पर भीतर कोई नहीं मिलता—
वे लौट जाती हैं,
अपमानित, उपेक्षित।
सार्थक डूबान
मन को इतना भर देता है
कि रिक्तता को जगह नहीं मिलती।
ध्यान इतना गहरा होता है
कि तुच्छ आकर्षण
केवल मच्छर-सी भनभनाहट बनकर रह जाते हैं।
पर सावधान!
हर डूबना साधना नहीं होता।
कुछ डूबान
बेहोशी का इंजेक्शन होते हैं—
जहाँ दर्द इसलिए नहीं मिटता
कि समाधान मिला है,
बल्कि इसलिए कि
संवेदना ही सुन्न हो गई है।
व्यस्तता वहाँ भी होती है—
सूचीबद्ध काम,
खोखले लक्ष्य,
रटी-रटाई दिनचर्या।
सब कुछ चलता रहता है,
सिवाय आत्मा के।
ऐसा काम
मीठा ज़हर है—
अच्छा लगता है,
अच्छा होता नहीं।
वह तुम्हें तुमसे काट देता है,
और तुम तालियाँ बजाते रहते हो
अपनी ही अनुपस्थिति पर।
सही डूबान
इसके ठीक उलट है।
वह आँखें खोलता है,
पलकें नहीं झपकाता।
वह चेतना को धार देता है,
नींद नहीं, जागरण देता है।
हाँ,
उसमें दर्द ज़्यादा दिखता है—
क्योंकि अब आँखें खुली हैं।
पर अब दर्द मालिक नहीं रहता,
तुम रहते हो।
सुख-दुःख के झूले से उतरकर
तुम उस ज़मीन पर खड़े होते हो
जहाँ प्रतिक्रिया नहीं,
चेतना बोलती है।
यही विडम्बना है—
सार्थक में डूबना
तुम्हें और अधिक महसूस कराता है,
और फिर भी
तुम्हें उनसे ऊपर उठा देता है।
सही चीज़ में डूब जाओ
तो वह वरदान है,
मुक्ति है,
पर गलत में डूबना
जीवन नहीं—
केवल खो जाना है।





