एकांत ही पहला गुरु है
अकेलापन
दुश्मन नहीं,
पहला गुरु है—
पर हम
उससे लड़ते रहते हैं।
हम अकेले नहीं होते,
हम अकेले जन्म लेते हैं।
जन्म के साथ ही
अलगाव का बीज
हममें बो दिया जाता है।
शिशु रोता है
भूख से नहीं,
दर्द से नहीं—
सिर्फ इसलिए
कि कोई पास नहीं है।
माँ की उपस्थिति
दूध से पहले
शांति बन जाती है।
यही आदत
बड़ी होकर
अहंकार बन जाती है—
एक बेचैन “मैं”
जो अपने आप में
पूरा नहीं होता।
मैं पुरुष हूँ।
मैं सफल हूँ।
मैं प्रेम में हूँ।
मैं आस्थावान हूँ।
“मैं”
हर बार
अपने पीछे
कुछ जोड़ लेता है,
उम्मीद में
कि अब शांति मिलेगी।
पर शांति नहीं मिलती,
क्योंकि
अहंकार
अधूरा रहकर ही
जिंदा रहता है।
अकेलापन
असल में
यह उम्मीद है
कि बाहर की कोई चीज
भीतर की कमी
भर देगी।
जब यह समझ
नहीं आती,
तो अकेलापन
दबा दिया जाता है—
शोर में,
भीड़ में,
नशे में,
व्यस्तता में।
दबा हुआ दर्द
मरता नहीं,
वह ज़हरीला हो जाता है।
लेकिन
जिस दिन तुम
अकेलेपन से
भागना छोड़ देते हो,
उसके पास बैठ जाते हो—
उसी दिन
कुछ बदलता है।
अकेलापन
तब सज़ा नहीं,
शिक्षा बन जाता है।
सबसे गहरे गीत
खुशी में नहीं,
खामोशी में जन्म लेते हैं।
सबसे सच्ची कला
तालियों में नहीं,
अंदर की टूटन में पलती है।
जिसने कभी रोया नहीं,
वह गा नहीं सकता।
जिसने कभी
अंदर की आग महसूस नहीं की,
वह सच लिख नहीं सकता।
मुक्त होना है
अकेलेपन से?
तो उससे
मुँह मत मोड़ो।
उसमें प्रवेश करो,
उसे समझो,
उसे बोलने दो—
वह तुम्हें
सिर्फ अपना चेहरा नहीं,
तुम्हारा असली चेहरा
दिखा देगा।





