जब नज़दीकी एक पिंजरा बन जाती है

When Closeness Becomes a Cage
(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद)

सच्चा प्रेम
तुम्हें मुक्त देखना चाहता है,
झूठा प्रेम
तुम्हें
अपनी आदत बनाना चाहता है।

जो रिश्ता
निर्भरता पर खड़ा है,
वह
स्वस्थ नहीं हो सकता।

जहाँ
दूसरा व्यक्ति
तुम्हारे सुख–दुख का
केन्द्र बन जाए,
वहाँ
चेतावनी की
घंटी बजनी चाहिए।

सब ठीक दिखे
तब भी
खुद से पूछते रहो—

क्या मैं
निर्भर तो नहीं हो गया?
क्या मैं
अनजाने में
शोषक तो नहीं बन रहा?

क्या मेरी अपेक्षाएँ
अब
स्वार्थ से रंगी हैं?
क्या सामने वाला
मुझसे
बहुत अधिक
चाहने लगा है?

क्या वह
इतना पास आ गया है
कि
अब मुझे
पूरा आकाश
दिखाई नहीं देता?

क्या वह
मेरे विचारों में
इतना भर गया है
कि
मेरे भीतर
साँस लेने की
जगह कम हो रही है?

ये सवाल
तब पूछो
जब कोई संकट नहीं है,
क्योंकि
जब संकट
दिखने लगता है—
अक्सर
तब बहुत देर
हो चुकी होती है।

सच्चा प्रेम
पास आता है
पर
घेरता नहीं।

वह
साथ चलता है,
पर
रास्ता नहीं रोकता।

अगर
निकटता
पिंजरा बन जाए,
तो समझ लो—
वह प्रेम नहीं,
डर है
जो
सुरक्षा का
नाम लेकर
तुम्हारी
उड़ान काट रहा है।

प्रेम को
इतना पास रखो
कि
उष्मा मिले,
पर
इतना नहीं
कि
आकाश
छूट जाए।
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