मैं तुमसे प्यार करता हूँ, सच में?
जिस क्षण
तुम्हारी ज़रूरत
पूरी नहीं होती,
उसी क्षण
जिसे तुम प्रेम कहते थे
वह
झुँझलाहट
और
आरोप में बदल जाता है।
एक दुर्भाग्यपूर्ण जोड़ा है—
वह सीधे नहीं कहती—
“मुझे एक ड्रेस चाहिए।”
वह कहती है—
“डार्लिंग,
तुम मुझसे प्यार ही नहीं करते।”
और वह समझ जाता है—
ड्रेस चाहिए।
वह भी
सीधे नहीं कहता
कि उसे क्या चाहिए।
वह बस कह देता है—
“I love you.”
और वह समझ जाती है—
इसका अर्थ क्या है।
जब वह कहता है
“मैं तुमसे प्यार करता हूँ,”
तो असल में
वह कह रहा होता है—
अब अपनी इच्छाएँ
पूरी करो।
वाकई
एक दुखद जोड़ा।
काश
दुनिया में
ऐसे रिश्ते
न होते।
स्त्री हो या पुरुष,
अक्सर
हम यह मान लेते हैं
कि
इच्छाओं की पूर्ति
ही
प्रेम की
पराकाष्ठा है।
पर यह
आत्म-भ्रम है।
सुख का लेन-देन,
देह या सुविधा की अदला-बदली—
यह
प्रेम नहीं।
यह तो
सौदा है,
व्यापार है,
बार्टर सिस्टम है।
असल सवाल यह है—
क्या प्रेम
अपने “मैं” को
संतुष्ट करने का नाम है,
या
अपने “मैं” को
घुला देने का?
इस पर
शोर मत करो,
तर्क मत दो—
बस
ध्यान करो।
शायद
यहीं से
प्रेम की
सचमुच
शुरुआत हो।





