अनंत से प्रणय
अनंत
न कल्पना है,
न कल्पना के पार कोई लोक—
अनंत है
अपनी सीमाओं को
निरंतर
ललकारते रहना।
तुमसे
असंभव नहीं माँगा गया,
बस इतना कहा गया है—
जो हो सकता है,
उसे
पूरा करो।
सीमा तोड़ो मत,
सीमा तक पहुँचो।
क्षमता बढ़ाओ मत,
क्षमता को
खर्च कर दो।
यही चुनौती है—
आगे निकलना नहीं,
खुद को
थका देना
सार्थकता में।
जब तुम
सच में
सब दे देते हो,
तभी
परिणाम
दिखाई देने लगते हैं।
और जब
पहला परिणाम आता है,
अनुशासन
आसान हो जाता है।
अब तुम जान जाते हो—
जितना देता हूँ,
उतना पाता हूँ।
यह विश्वास
तुम्हें
खतरनाक बना देता है—
अडिग,
अविराम।
पर एक नियम याद रखना—
अपने स्तर पर
कम-से-कम
इतना ज़रूर करो
कि
कोई परिणाम
जन्म ले सके।
क्योंकि
सबसे बुरी जगह वह है
जहाँ
मेहनत भी हुई,
पीड़ा भी सही,
पर
सूचकांक
हिला ही नहीं।
थके हो तुम,
पर
रिक्त हाथ।
कीमत चुकाई,
पर
कुछ खरीदा नहीं।
न लाभ,
न गति,
न विश्वास।
इसलिए याद रखो—
अनंत
असंभव नहीं माँगता।
वह बस
यह चाहता है
कि
तुम
कुछ भी
संभालकर
न रखो।





