क्षमा के परे
तुम
रंजिश इसलिए रखते हो
क्योंकि
तुम चाहते हो
लोग
तुम्हारी कल्पनाओं में
फिट हों।
वे नहीं होते।
और
घाव
इच्छाओं को लगता है।
तुम्हारी अपेक्षाएँ
दूसरों को
तुम पर
शक्ति दे देती हैं—
और
तुम्हें
असुरक्षित छोड़ जाती हैं।
दूसरों को
अपनी अपेक्षाओं से
मुक्त कर दो।
दूसरा
वह नहीं है
जो
तुम सोचते हो—
वह
वही है
जो वह है।
जब
लोग
तुम्हारी चाह के
अनुसार नहीं चलते,
तो
दर्द
सिर्फ
चाह को होता है।
यह देख पाना
कि
अधिकांश लोग
संस्कारों की
मशीनें हैं—
बंधे हुए,
पूर्वानुमेय—
यही
क्षमा है।
क्षमा
प्रतिशोध को
दबाना नहीं है।
क्षमा
यह भी नहीं है
कि
मन कहे—
चलो,
माफ़ कर देते हैं।
जब तक
माफ़ करने की
ज़रूरत है,
तब तक
मन
छोटी-छोटी
चीज़ों से
चिपका है—
चोट,
विकृति,
शिकायत।
क्षमा का प्रश्न
तभी उठता है
जब
तुम
अब भी
आहत हो।
“उसने
मुझे चोट पहुँचाई”—
यहीं
क्षमा अटकी है।
वास्तविक क्षमा
तब होती है
जब
चोट
याद ही न रहे।
जब
मन
उन बातों से
आगे निकल चुका हो
जो कभी
महत्वपूर्ण लगती थीं।
छोड़ना
तभी आसान होता है
जब
जीवन में
कुछ
सच में
महत्वपूर्ण
संभालने को
मिल जाए।
तब
क्षमा
एक क्रिया नहीं रहती—
वह
एक अनुपस्थिति
हो जाती है।





