अधिकांश ‘शास्त्र’ केवल पुराने ग्रंथ हैं

अधिकांश ‘शास्त्र’ केवल पुराने ग्रंथ हैं
(Most ‘Scriptures’ Are Just Old Books)
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, दृष्टान्तयुक्त, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता)

जो समय से बँधा है,
वह बदलेगा—
और जो बदले,
उस पर टिकना
कैसे संभव है?

सच्ची आध्यात्मिकता
उसकी खोज करती है
जो नहीं बदलता—
क्योंकि
केवल वही
भरोसेमंद है।

वेश बदले,
रीतियाँ बदलीं,
देवताओं के नाम बदले,
कथाएँ बदलीं—
हर सदी ने
अपने रंग चढ़ाए।

तो क्या
यही सत्य था?

अगर सत्य
पोशाक में होता,
तो कपड़े बदलते ही
मुक्ति मिल जाती।

अगर सत्य
भोजन में होता,
तो रसोई
तीर्थ बन जाती।

अगर सत्य
आचरण-संहिता में होता,
तो नैतिकता
बुद्धत्व बन जाती।

पर ऐसा
कभी हुआ नहीं।

जो ग्रंथ
बताते हैं
क्या पहनना है,
क्या खाना है,
किससे मिलना है,
किससे डरना है—
वे जीवन-शैली के
निर्देश हो सकते हैं,
पर
शास्त्र नहीं।

शास्त्र
नियमों की सूची नहीं होता,
शास्त्र
प्रश्न की आग होता है।

शास्त्र वही है
जो सीधा पूछे—
मैं कौन हूँ?
यह अस्तित्व क्या है?

दृष्टान्त

एक गाँव में
दो पुस्तकें थीं।

एक पुस्तक
पीढ़ियों से पूजी जाती थी।
लोग उसके आगे
दीप जलाते,
फूल चढ़ाते,
और कहते—
यही सत्य है।

दूसरी पुस्तक
किसी ने नहीं खोली।
उसमें
कोई आदेश नहीं थे,
कोई व्रत नहीं,
कोई स्वर्ग-नरक नहीं।

बस
एक प्रश्न लिखा था—
“तू कौन है
जो यह सब कर रहा है?”

पहली पुस्तक
ने लोगों को
अनुयायी दिए।
दूसरी पुस्तक
ने किसी को
शिष्य नहीं बनाया—
पर
जिसने उसे पढ़ा,
वह
अपने आप से
टकरा गया।

गाँव ने
पहली को
मंदिर में रखा,
दूसरी को
भूल गया।

पर रात में
जब कोई
अकेला होता,
डरा होता,
ईर्ष्या से जलता,
मृत्यु से काँपता—
तो पहली पुस्तक
चुप रहती,
और दूसरी का
प्रश्न
भीतर गूँजता।

आध्यात्म
संप्रदाय नहीं देखता।
वह नहीं पूछता
तुम आस्तिक हो
या नास्तिक।

तुम कहो—
“मैं ईश्वर को नहीं मानता।”
फिर भी
एक “मैं”
वहाँ मौजूद है।

आध्यात्म
उसी “मैं” में
प्रवेश करता है—
क्योंकि
सत्य का
एकमात्र द्वार
वही है।

हम सब
सुरक्षा चाहते हैं।
हम सब
संग-साथ चाहते हैं।
हम सब
अकेले पड़ने से डरते हैं।

हम शक्ति चाहते हैं,
मान्यता चाहते हैं,
ईर्ष्या से जलते हैं।

ये प्रश्न
कल भी थे,
आज भी हैं—
और रहेंगे।

जो ग्रंथ
इन प्रश्नों से
मुँह मोड़ ले,
वह
कितना भी पुराना हो—
शास्त्र नहीं।

हर पुराना ग्रंथ
पवित्र नहीं होता।
और जो सत्य नहीं,
वह
पवित्र कैसे हो सकता है?

पवित्रता
कथाओं में नहीं,
विश्वासों में नहीं,
स्मृतियों में नहीं।

पवित्रता है—
सत्य की
निर्भीक खोज में।

बाक़ी
अधिकांश पुराने ग्रंथ
मानव कल्पनाओं के
पुराने मैनुअल हैं—
उन्हें
संग्रहालय में
होना चाहिए,
पूजा-स्थल में नहीं।

पूजा
सत्य की हो,
काग़ज़ की नहीं।
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