If Truth Hurts, Niceness Kills
(अगर सत्य चुभता है, तो ‘नाइसनेस’ मार डालती है)
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, दृष्टान्तयुक्त अतुकांत कविता)
जो तुम्हें
वही कहे
जो तुम सुनना चाहते हो—
उसे तुम
“अच्छा इंसान” कहते हो।
जो तुम्हें
वही कहे
जो तुम्हें सुनना ज़रूरी है—
उसे तुम
निर्दयी मान लेते हो।
कितने भोले हैं हम—
मुस्कान पर जीवन गिरवी रख देते हैं,
दो मीठे झूठ
हमें काफ़ी लगते हैं
प्यार मान लेने को।
“वह मेरा दोस्त है।”
क्यों?
“बहुत मीठा बोलता है,
गले लगाता है,
हाल-चाल पूछता है।”
बस?
हाँ—
क्योंकि मैं
सतह पर जीता हूँ,
और सतह को
चाशनी चाहिए।
और जो
डाँटता है,
पर्दा हटाता है,
सीधे बोल देता है—
उसे मैं नापसंद करता हूँ।
क्योंकि वह
मेरी मूर्खता
दिखा देता है।
दृष्टान्त
एक नगर में
दो वैद्य थे।
पहला
हर रोगी से कहता—
“सब ठीक है,
चिंता मत करो।”
उसकी दुकान पर
भीड़ रहती थी,
हँसी रहती थी।
दूसरा
नाड़ी पकड़ता,
आँख मिलाकर कहता—
“रोग गहरा है,
इलाज कड़ा होगा।”
उसकी दुकान
अक्सर खाली रहती थी।
एक दिन
एक व्यक्ति
गंभीर रोग लेकर आया।
पहले वैद्य ने
मुस्कुराकर कहा—
“कुछ नहीं,
घर जाओ,
मज़े करो।”
दूसरे ने कहा—
“यह सच सुनना कठिन है,
पर यदि अभी नहीं जागे
तो बचना मुश्किल है।”
व्यक्ति
पहले की
मुस्कान लेकर गया—
और कुछ महीनों में
चुपचाप चला गया।
नगर ने कहा—
“वह वैद्य बहुत nice था।”
सत्य बोलने वाला
अकेला रह गया।
क्या डॉक्टर
तुम्हें बताए—
“तुम्हें कैंसर है”—
तो वह शत्रु हो गया?
या वह जो कहे—
“सब बढ़िया है,
पार्टी करो”—
वही मित्र है?
यह कैसी
विकृत समझ है!
Niceness
धुँधली होती है,
आरामदेह होती है,
पर
अंधी होती है।
वह तुम्हें
जहाँ हो
वहीं सुला देती है।
सच्ची भलाई
कुछ और है—
वह पहले
तुम्हें दिखाती है
कि भीतर कितना
सड़ा हुआ जमा है।
और उस सड़ांध से
मुक्ति
न स्वचालित होती है,
न सुखद।
उसके लिए
तुम्हें
अपने ही भ्रमों की
परतें उतारनी पड़ती हैं—
जिन्हें तुम
अब तक
“मैं” कहते आए हो।
अच्छाई
सब कुछ पाने लायक है—
पर कीमत?
अपने भ्रमों को
जलते देखने का
साहस।
क्या दर्द होता है?
हाँ।
इसीलिए
सच्ची अच्छाई
अक्सर
nice नहीं लगती।
पर याद रखना—
सत्य कभी-कभी चुभता है,
पर
मीठा झूठ
धीरे-धीरे
मार डालता है।





