“हर अपराध चीखता नहीं”
हर अपराध
अख़बार में नहीं आता,
कुछ
रोज़मर्रा की हवा में
घुलकर
औरत की साँसों में उतर जाते हैं।
शादी के बाद
काम करने की मनाही—
कोई शोर नहीं।
दफ़्तर में
छेड़छाड़—
“चलता है” कहकर
फाइल बंद।
प्रसव में मौत—
एक आँकड़ा।
रात की सड़क—
उसके लिए नहीं।
उसका शरीर—
उसकी पहचान।
तालियाँ बजती हैं।
नेतृत्व में उसकी कमी—
किसे फ़ुर्सत है सोचने की?
फिर एक दिन
कोई जघन्य बलात्कार—
और देश
अचानक जाग जाता है।
मोमबत्तियाँ,
नारे,
डिबेट,
टीआरपी।
पूछो—
हम किस पर रो रहे हैं?
उसके दर्द पर,
या
ख़बर के मसाले पर?
सच कड़वा है—
ज़्यादातर भीड़
न्याय नहीं चाहती,
उत्तेजना चाहती है।
ड्रामा ख़त्म,
ग़ुस्सा ठंडा—
और व्यवस्था
फिर से आराम से बैठ जाती है।
अगर सच में चिंता होती,
तो
हमें किसी बलात्कार का
इंतज़ार नहीं करना पड़ता।
हम रोज़ पूछते—
क्या वह सुरक्षित है?
क्या वह स्वतंत्र सोच सकती है?
क्या वह “ना” कह सकती है
बिना डर के?
सच्ची चिंता
नारे से नहीं,
परवरिश से शुरू होती है।
क्या हमने
अपनी बेटियों को
आज्ञाकारी बनाया,
या
जिज्ञासु?
क्या हमने
उन्हें सहना सिखाया,
या
चुनना?
जब तक
छोटे अपमान
हमारी आँखों से
फिसलते रहेंगे,
तब तक
बड़ा अपराध
आता रहेगा—
और
हम हर बार
नाटक करते रहेंगे।
क्योंकि
असल हिंसा
अक्सर
चुप रहती है।





