पवित्र असंतोष”
जीवन एक है—
इसलिए
ठहरना अपराध है।
हम हालात से
समझौता कर लेते हैं,
क्योंकि वे
पहचाने हुए होते हैं,
सही इसलिए नहीं।
जहाँ गिरा दिया गया,
वहीं
घर बना लिया।
लोग कहते हैं—
तनाव है,
व्यवस्था खराब है,
दुनिया कठिन है।
पर भीतर
एक आराम छुपा है—
गलत जीवन का
आराम।
दुख है,
पर जाना नहीं चाहते।
सच्चा असंतोष
शिकायत नहीं करता,
वह
रूपांतरण माँगता है।
वह कहता है—
यह जीवन
मेरी ऊँचाई के
योग्य नहीं।
त्रासदी यह नहीं
कि हम पीड़ित हैं,
त्रासदी यह है
कि हम वहीं टिके हैं
जहाँ पीड़ा है,
और कहते हैं—
“चलता है।”
जैसे समझौता
आदत बनता है,
वैसे ही
न-समझौता भी
संस्कार बन सकता है।
अपने भीतर
एक विद्रोह पालो—
चुपचाप,
लगातार।
जहाँ सुविधा मिले,
वहीं
सवाल खड़ा करो।
जहाँ सहज लगे,
वहीं
खुद को हिलाओ।
जब कोई कारण न दिखे,
तब भी
आगे बढ़ो।
जब कोई साथ न दे,
तब भी
ऊपर उठो।
बेचैनी को
पवित्र बनाओ।
इंकार को
अनुशासन बनाओ।
और जब
ऊँचाई मिल जाए—
तो वहीं
डेरा मत डालना।
क्योंकि जीवन
किसी शिखर का नाम नहीं,
जीवन
लगातार
ऊपर उठते रहने का
साहस है।





