“एक-दूसरे की ओर नहीं, ऊपर की ओर”
संबंध का
एक ही सवाल है—
वह तुम्हें
उसकी ओर खींचता है,
या
तुम्हारी ऊँचाई की ओर?
अगर उसकी मौजूदगी में
तुम
उसके मूड के
चक्कर काटते हो,
उसकी स्वीकृति के
इंतज़ार में रहते हो—
तो वह प्रेम नहीं,
आश्रितता है।
जो तुम्हें
अपनी पहली प्राथमिकता
बनाना चाहता है,
पर तुम्हारे
विकास की चिंता नहीं करता—
वह
साथी नहीं,
केंद्र बनना चाहता है।
साधारण प्रेम में
एक चुप हिंसा होती है—
मैं तुम्हें चाहूँ,
ताकि
मैं अकेला न रहूँ।
यह चाह
प्यार जैसी लगती है,
पर
यह डर से जन्मी होती है।
योग्य साथी
तुमसे
तुम्हारा शरीर नहीं माँगता,
तुम्हारा समय नहीं हड़पता—
वह पूछता है—
तुम
और स्पष्ट कैसे हो सकते हो?
उसके साथ
चलना
चिपकना नहीं होता।
उसके साथ
होना
खो जाना नहीं होता।
ऐसे संबंध में
यात्रा
एक-दूसरे की ओर नहीं,
ऊपर की ओर होती है।
साथ-साथ,
कंधे से कंधा मिलाकर—
पर
आत्मा स्वतंत्र।
यही प्रेम है—
स्वामित्व नहीं,
आसक्ति नहीं—
स्पष्टता की
साझी चढ़ाई।





