“तीसरी स्त्री”
पहली स्त्री—
जिसे
जीवविज्ञान के नाम पर
संस्कारों ने गढ़ा।
सिखाया गया—
मुस्कराओ,
सह लो,
सज कर रहो।
तुम्हारी कीमत
तुम्हारे शरीर में है।
दूसरी स्त्री—
विद्रोही।
क्रोधित,
तैयार।
उसने कहा—
मैं भी वही करूँगी
जो तुम करते हो।
वही कपड़े,
वही भाषा,
वही दौड़।
पर शांति?
वह भी नहीं मिली।
दासता बदली,
पर ढाँचा वही रहा।
प्रतिक्रिया
दोहराव बन गई।
और अब
तीसरी स्त्री की
संभावना है।
न परंपरा की कैदी,
न विद्रोह की नकल।
वह
न शरीर से इनकार करती है,
न उसे
पहचान बनाती है।
वह जानती है—
मैं पहले
चेतना हूँ,
बाद में
स्त्री।
वह
अपनी इच्छाओं को
देखती है,
उनकी पूजा नहीं करती।
वह
अपने पैटर्न पहचानती है,
उनकी गुलाम नहीं बनती।
वह
न झुकती है,
न टकराती है—
वह
साक्षी रहती है।
उसका लक्ष्य
पुरुषों के बराबर होना नहीं,
मुक्त होना है।
उसकी लड़ाई
सत्ता के लिए नहीं,
सत्य के लिए है।
वह
जीवविज्ञान की
क़ैदी नहीं,
संस्कृति की
कैदी नहीं।
वह
अपनी चेतना को
उसकी
उच्चतम संभावना तक
जीने देती है।
दुनिया को
न पहली स्त्री चाहिए,
न दूसरी।
दुनिया को
तीसरी स्त्री चाहिए—
जो
अनुकरण नहीं,
प्रतिक्रिया नहीं,
पर
साक्षात्कार है।
जिस दिन
और स्त्रियाँ
इस तीसरे द्वार को
खोलेंगी,
उसी दिन
इस दुनिया का
बहुत सा
हिंसक शोर
ख़ामोश होने लगेगा।





