“जलवायु पतन का भावनात्मक इंजन”
हम जंगल से उठे,
और जंगल को ही
खाने लगे।
क्योंकि
हम बुद्धि से नहीं,
भावना से
चलने लगे।
एक इच्छा उठती है—
विदेश यात्रा।
दिल रोमांच से भरता है।
आकाश में
एक और उड़ान,
धरती पर
एक और बोझ।
भावना
कार्बन बन जाती है।
एक सपना पलता है—
अपना सुरक्षित घोंसला।
सीमेंट,
स्टील,
पेड़ कटते हैं।
डर कहता है—
और बड़ा,
और पक्का।
डर भी
कार्बन है।
एक तस्वीर बनती है—
परफेक्ट परिवार।
दो बच्चे,
मुस्कान,
भविष्य।
पर
अनियंत्रित चाह
जनसंख्या बनती है,
और जनसंख्या
दबाव।
यह भी
कार्बन है।
ध्यान दो—
हर बार
जब हम
बिना देखे
भावना के हवाले होते हैं,
कहीं न कहीं
धरती
थकती है।
बाज़ार
इसीलिए
भावना जगाता है—
खरीदो,
मनाओ,
उत्सव करो।
उत्तेजना में
सोच बंद,
और उपभोग
खुला।
हैरानी है—
जो पर्यावरण की
बात करते हैं,
वे
अपने मन की
जलवायु
देखना नहीं चाहते।
असली संकट
नीतियों का नहीं,
असंतुलित
भावनाओं का है।
बिना जाँची भावना
भूख है—
जो
इस धरती को
खा जाएगी।
समाधान
भावना को मारना नहीं।
समाधान है—
उसे
बुद्धि के प्रकाश में
स्नान कराना।
जब केंद्र
स्पष्ट होता है,
तो भावना
सुंदर ही नहीं,
पवित्र होती है।
भीतर
बुद्धि का मौसम बदले—
तो
बाहर
जलवायु
अपने आप
संभलने लगती है।
धरती को
तकनीक नहीं,
जाग्रत मन
बचाएगा।





