सब ठीक है… जब तक टूट नहीं जाता

सब ठीक है… जब तक टूट नहीं जाता

सब ठीक है—
यह वाक्य
अक्सर मुस्कान की आड़ में
छुपा हुआ डर होता है।

जो सुख
किसी सहारे पर टिका हो,
वह सुख नहीं—
असुरक्षा है।

कुछ लोग
हमेशा उदास दिखते हैं,
और कुछ
हमेशा हँसते रहते हैं।
आवाज़ मुलायम,
चेहरा उजला—
पूछो कैसे हो?
तुरंत जवाब मिलता है—
सब ठीक है।

पर यह ठीक होना
बहुत पतला होता है।
जरा सा खरोंचो,
तो नीचे
दबी हुई पीड़ा
साँस लेने लगती है।

एक छोटी असफलता,
एक छोटा झटका—
और भीतर की शांति
बिखर जाती है।
हँसी गायब,
चिंता हावी।

अगर कल्याण
वास्तव में गहरा होता,
तो क्या मन
इतनी आसानी से
ढह जाता?

विडंबना यह है—
यही लोग कहते हैं:
मुझे ज्ञान की ज़रूरत नहीं,
मुझे अध्यात्म नहीं चाहिए,
मैं पहले से ठीक हूँ।

और यही लोग
सबसे पहले
चिंता, अवसाद
और टूटन के
शिकार बनते हैं।

सच्चा सुख
सुंदर है।
जीयो—
आनंद से,
जीवंत होकर।

वेदांत कहता है—
“निरामयोऽहम्”
कल्याण
मेरा स्वभाव है।

पर वह स्वभाव
तभी प्रकट होता है
जब तुम
वही पुराने इंसान
रहना छोड़ दो।

जब अतीत की पहचान
टूटती है,
तभी
असल कुशलता
उभरती है।

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