जिसने गलती की, उससे आगे बढ़ जाओ

जिसने गलती की, उससे आगे बढ़ जाओ

सबसे कठोर सज़ा यह नहीं कि
तुम खुद को दंड दो—
सबसे कठोर सज़ा है कहना:
मैं वैसा बना नहीं रहूँगा।

सज़ा
बदला नहीं होती।
सज़ा
सुधार है।

जो दंड
सिर्फ पीड़ा दे,
पर दृष्टि न खोले—
वह न्याय नहीं,
अहंकार का अभिनय है।

असल दंड
घटना पर नहीं पड़ता।
क्षण पर नहीं।
कर्म पर भी नहीं।

वह पड़ता है
करने वाले पर—
उस प्रवृत्ति पर
जो बार-बार
वही गलती रचती है।

और दंड क्या है?
मृत्यु।

उस पुराने “मैं” की मृत्यु
जो बार-बार
अनचाहा परिणाम
उत्पन्न करता है।

जब तुम कहते हो—
अब यह प्रवृत्ति
जीने योग्य नहीं है,
तब अहंकार
सबसे ज़्यादा
तड़पता है।

क्योंकि अहंकार
दुख सह लेता है,
पर
परिवर्तन नहीं।

यही
एकमात्र उपयोगी दंड है—
रूपांतरण।

उस व्यक्ति बने रहने से इंकार
जिसे सज़ा की ज़रूरत पड़ती है।

मैं अब
वह नहीं हूँ—
यही
सबसे ऊँची सज़ा है
जो तुम
खुद को दे सकते हो।

यदि तुम
वही बने रहे,
तो तुम्हारी भूलें भी
वही रहेंगी।

अपराध-बोध को
व्यर्थ मत जाने दो।

जब अपराध-बोध
सच्चा होता है,
तो वह
उत्प्रेरक बनता है—
गहरी क्रांति का।

जो अपराध-बोध
बदलाव तक न ले जाए,
वह
नैतिक रंगमंच है।

और जो दंड
जगाए बिना
सिर्फ चोट पहुँचाए—
वह
अज्ञानपूर्ण प्रतिशोध है।

गलती को मत सज़ा दो।
उससे आगे बढ़ जाओ
जिसने गलती की थी।

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