अंदर की आग, बाहर की राख
जंगल जल रहे हैं—
पर यह
सिर्फ पेड़ों की आग नहीं है।
यह मन की आग है
जो दिखाई देने लगी है।
धरती के जंगल
और मनुष्य का मन—
दो अलग त्रासदियाँ नहीं।
दोनों
एक ही आग में
भस्म हो रहे हैं।
यह आग
भूख है।
लालच है।
झूठी पहचानों की
अंतहीन जलन है।
पूरा होने की चाह में
मनुष्य ने
दुनिया को जला डाला।
पेड़ कटे,
नदियाँ ज़हरीली हुईं,
आकाश काला हुआ—
फिर भी
उसकी तृष्णा
शांत नहीं हुई।
कभी होगी भी नहीं।
पूरे ब्रह्मांड को
धूल बना दो—
तो भी
उसकी भूख
बची रहेगी।
क्योंकि वह
शांति को
गलत रास्ते पर
ढूँढ रहा है।
उसे लगता है—
उत्तेजना ही तृप्ति है।
भोग ही शांति है।
यह उपदेश नहीं—
यह तथ्य है।
मन में आग है,
जंगल में आग है।
एक दिखती है,
दूसरी छुपी रहती है।
पर दोनों
एक ही हैं।
जलते पेड़
उसके जलते विचार हैं।
आकाश का धुआँ
उसके मन का कुहासा है।
बाहर की तबाही
भीतर की
प्रतिछवि है।
आध्यात्मिक शून्यता
मनुष्य को
अंदर से मार रही है—
और पृथ्वी को
बाहर से।
जिसे हम
पर्यावरण संकट कहते हैं,
वह दरअसल
मन की टूटन है
जो संसार से टकरा रही है।
जब तक
मनुष्य
भीतर नहीं मुड़ता,
खुद से नहीं मिलता,
अपने झूठ को
नहीं घोलता—
तब तक
वह इस ग्रह को
श्मशान बनाता रहेगा।
और
तालियाँ बजाएगा।
इसे प्रगति कहेगा।
इसे विकास बताएगा।
इसे सफलता बेच देगा।
पर यह होगा
सिर्फ
एक अंतिम यात्रा—
राख में लंगड़ाती
एक प्रजाति,
उस दुनिया के बीच
जिसे उसने
कभी समझा ही नहीं।
एक मरा हुआ मन—
जो
अपने ही सन्नाटे से
भागने के लिए
जो भी छूता है,
जला देता है।





