क्या जीवन सच में शुरू भी हुआ है?

क्या जीवन सच में शुरू भी हुआ है?

यदि तुम
घड़ी के बोझ तले दबे हो,
घंटों के गुलाम हो—
तो यह
तुम्हारे उद्देश्य पर
आरोप है।

जिस काम का
सही कारण होता है—
जो बाहर से नहीं,
भीतर की स्पष्टता से
जन्म लेता है—
उसमें
समय गिना नहीं जाता।

पढ़ते हुए,
काम करते हुए,
यहाँ तक कि
साँस लेते हुए भी—
घड़ी
चुप हो जाती है।

और यदि तुम युवा हो,
तो सुन लो—
यह तुम्हारा
टाल न सकने वाला
कर्तव्य है
कि जीवन के
सही कारण
खुद गढ़ो।

यह भीड़ का काम नहीं।
यह
अकेला,
कठोर,
पीड़ादायक कार्य है।

यह मत कहो—
कोई और नहीं कर रहा,
तो मैं क्यों करूँ?

तुम्हारे पास
अपनी
एकमात्र,
क्षणभंगुर
ज़िंदगी है।

उसे
सामूहिक
सुस्ती के हवाले
मत कर दो।

अपने समय के लिए
कुछ सच में
योग्य खोजो।

तभी
समय
अपने सही उपयोग की
ओर
दौड़ पड़ेगा।

और जब
किसी चीज़ का
उपयोग सही हो रहा हो,
तो
उसे सीमित करने का
साहस क्यों?

तब
घंटे नहीं लगते—
घंटे
डूब जाते हैं।

तब श्रम
श्रम नहीं रहता,
वह
तुम्हारे
अंतरतम की
अभिव्यक्ति बन जाता है।

याद रखो—
समय
उड़ता नहीं।

वह
तुम्हारे मूल्यों के
पीछे-पीछे
चलता है।

यदि समय
खोया हुआ लगता है,
तो इसलिए कि
तुम
अचेतनता को
मूल्य दे रहे हो।
मान्यता को,
स्वीकृति को।

तो
बंधन तोड़ो।

यही
आत्म-प्रेम का
चरम रूप है—
अपनी शक्ति को
जागृत करना,
जो सच में मायने रखता है
उसे चुनना,
और
बिना बाहरी परिणामों के डर के
पूरा जीना।

यही एकमात्र तरीका है
जिससे
जीवन
वास्तव में
शुरू होता है।

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