खून बहती नाक बेहतर है, खून बहता दिल नहीं

*खून बहती नाक बेहतर है, खून बहता दिल नहीं**

सबसे पहले
लक्ष्य चुनो—
और वह
योग्य होना चाहिए।

योग्य लक्ष्य
आरामदेह नहीं होते।
उन्हें
सुविधा देखकर
नहीं चुना जाता।

डर के बीच
सच कहना,
कड़वाहट के बीच
दयालु बने रहना,
शोरगुल में
भीतरी स्पष्टता
ढूँढना—

इनमें से
कुछ भी
आसान नहीं है।

जहाँ लक्ष्य
योग्य होगा,
वहाँ
हारें भी होंगी।
छोटी-छोटी।
बार-बार।

उन्हें
ज़्यादा अर्थ मत दो।

अगर
हर छोटी हार
तुम्हें तोड़ दे,
तो
तुम टिक नहीं पाओगे।

लज्जा आएगी,
घबराहट होगी,
और
तुम मैदान
छोड़ दोगे।

छोटी हारों को
कंधे उचकाकर
आगे बढ़ने दो—
ताकि
बड़ी हार
दूर रहे।

और
बड़ी हार क्या है?

किसी योग्य उद्देश्य से
हाथ खींच लेना।

स्पष्ट रहो—
छोटी हार
अपरिहार्य है।
बड़ी हार
वैकल्पिक।

डटे रहो।
घूँसे
सीधे ठोड़ी पर लो।

नाक से
खून बह जाए
तो चल जाएगा।

पर
दिल से
खून बहना—
यह
स्वीकार्य नहीं।

क्योंकि
योग्य युद्ध में
पिट जाना
हार नहीं है।

हार है—
यह जानते हुए भी
कि युद्ध ज़रूरी था,
मैदान में
उतरे ही नहीं।

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