दर्द में खेलो
दर्द में खेलो।
दर्द के साथ खेलो।
बस
खेलते रहो।
दर्द है—
हाँ।
पर जब
किसी सार्थक चीज़ में
पूरी तरह डूबे हो,
तो क्या
दर्द पर
ध्यान बचता है?
वह
किनारे चला जाता है।
केंद्र नहीं बनता।
उद्देश्य को
हाइजैक नहीं करता।
एक साधारण खिलाड़ी भी
यह जानता है—
जीत की दौड़ में
दर्द
दूसरे नंबर पर होता है।
जब तक
स्ट्रेचर न आए,
खेल
रुकता नहीं।
दोपहर का सूरज
आग उगल रहा है।
गर्मी असह्य है।
क्या खिलाड़ी
मौसम से
मोलभाव करते हैं?
नहीं।
सूरज
जहाँ होना चाहिए
वहाँ है।
देह
जहाँ होनी चाहिए
वहाँ है।
तो तुम
कहाँ हो?
क्यों
भटक रहे हो?
क्यों
अस्तित्वतः
बेघर हो?
क्यों
अब भी
आराम ढूँढ रहे हो
जब पुकार
प्रतिबद्धता की है?
दर्द
कभी पूरी तरह
जाता नहीं।
यह
डिज़ाइन की
गलती नहीं—
डिज़ाइन है।
जीवन
दर्द देता रहेगा।
यही सौदा है।
पर
दर्द से गहरी
एक दिशा होती है—
जो
राहत नहीं माँगती,
केवल
दिशा चाहती है।
जब तुम
उससे
संरेखित होते हो,
तो
दर्द
खत्म नहीं होता—
पर
अपनी पकड़
खो देता है।
वह
पृष्ठभूमि बन जाता है।
तुम
असुविधा से
बातचीत नहीं करते—
तुम
जीने में
व्यस्त होते हो।
एक जगह से जियो
जहाँ
दर्द
पहुंच ही न सके।
वही
अभेद्य स्थान—
तुम्हारा
असल घर है।





