तैयार होने से पहले कूदो

तैयार होने से पहले कूदो

ताक़त
कोई जमा पूँजी नहीं है।
वह
प्रतिक्रिया है।

अधिकांश लोग
एक अजीब विश्वास में
घुटते रहते हैं—
कि हम कमज़ोर हैं,
असमर्थ हैं,
शायद बेकार भी।

हम बहुत सी बातों में
संदेह करते हैं,
पर एक बात में
अद्भुत रूप से
निश्चित होते हैं—
मेरे पास
इतनी शक्ति नहीं है।

और इस विश्वास के पक्ष में
हमारे पास
तर्क हैं,
स्मृतियाँ हैं,
अनुभवों का
एक पहाड़ है—
जो इस
धीमे आत्म-अपमान को
सही ठहराता है।

ऐसे मन से
यह कहना भी व्यर्थ है
कि ताक़त भीतर छुपी है।

यदि छुपी होती,
तो
कम से कम
उसकी धड़क
महसूस होती।

सच यह है—
ताक़त
पहले से मौजूद नहीं होती।
वह
जन्म लेती है।

और वह जन्म
तभी होता है
जब
तुम
किसी योग्य चुनौती को
स्वीकार करते हो।

साहस
डर का अभाव नहीं है।
साहस है—
डर को
निर्णय पर
हावी न होने देना।

ताक़त
बचत खाते में
पड़ी नहीं रहती।
वह
किसी ताले से
खुलती नहीं।

वह
उसी क्षण
भड़क उठती है
जब तुम
सही युद्ध में
कदम रखते हो।

यह
भंडार खोलने जैसा नहीं,
बल्कि
कुछ ऐसा है
जो
शून्य से
उभर आता है—
अकल्पनीय,
अप्रत्याशित।

चुनौती स्वीकार करो—
इसलिए नहीं
कि वह जीती जा सकती है,
बल्कि इसलिए
कि वह योग्य है।

तभी
तुम
उस संभावना की
झलक पाते हो
जो
हमेशा से थी—
पर
बुद्धि से
अदृश्य रही।

तुम्हें
खाली जेब से
देने का साहस करना होगा।

तभी
दिखेगा
कि वे जेब
कभी
खाली थीं ही नहीं।

तुम्हें
आश्वासन के बिना
प्रेम करना होगा।
तालियों के बिना
बोलना होगा।
ताक़त के बिना
लड़ना होगा।

इनाम के लिए नहीं—
सिर्फ़ इसलिए
कि यह
सही है।

यही वह क्षण है
जब
भीतर का
कोष
फट पड़ता है।

यदि तुम
ताक़त महसूस होने तक
प्रतीक्षा करते रहे,
तो
मैदान के बाहर
सड़ जाओगे।

तलवार
ज़ंग खा जाएगी।
युद्ध
गुज़र जाएगा।

और तुम
अपरिक्षित ही
मर जाओगे—
अपनी ही
अजन्मी संभावना से
अनजान।

यदि अर्जुन
पूर्ण स्पष्टता की
प्रतीक्षा करता,
तो
गीता
कभी उतरती ही नहीं।

कृष्ण का ज्ञान
किसी सिद्ध पुरुष को
नहीं मिला।

वह मिला
एक टूटे हुए,
काँपते हुए,
उलझे हुए मनुष्य को—
जो
फिर भी
मैदान में
खड़ा था।

वह पूर्ण नहीं था।
पर
वह उपस्थित था।

यही
एकमात्र मुद्रा थी
जो चलती थी।

उसने
सब उत्तर नहीं जाने—
पर
ईमानदारी से
आया।

और वही ईमानदारी
चिंगारी बनी।
ताक़त
पीछे-पीछे
आ गई।

यही
भयानक और सुंदर
रहस्य है—

जो सही है,
उसे करो,
भले ही
अंदर से आवाज़ आए—
मैं तैयार नहीं हूँ।

ताक़त की
प्रतीक्षा मत करो।
निश्चितता के आगे
गिड़गिड़ाओ मत।

कूदो।

समृद्ध महसूस करने से पहले
दे दो।
तैयार होने से पहले
लड़ो।

यही वह
निर्दय,
अडिग निर्णय है
जो
भीतर का ताला
तोड़ देता है।

कैसे?

अज्ञात में
एक समर्पित छलांग से—
बिना सहारे,
बिना गारंटी,
सिर्फ़
इस विश्वास के साथ
कि कर्म
सही है।

तुम्हारा खज़ाना
कभी अनुपस्थित नहीं था।

वह
सिर्फ़
बुलाया नहीं गया था।

वह
चालाक योजनाओं से
नहीं खुलता।
सुरक्षित गणनाओं से
नहीं।

वह
तभी फूटता है
जब
तुम
नग्न विश्वास के साथ
अज्ञात में
कूदते हो।

जिसे तुम
अनुपस्थिति समझते हो,
वह
अनुरोधित न की गई
उपस्थिति है।

तुम
कभी गरीब नहीं थे।
कभी कमज़ोर नहीं थे।
कभी खाली नहीं थे।

तुम
सिर्फ़
अपने बारे में
अज्ञानी थे।

और यह ज्ञान
उन्हीं को मिलता है
जो
अज्ञात को
साहसपूर्वक
आमंत्रित करते हैं।

संसाधन
किससे खुलते हैं?

उस निर्णय से—
लड़ने का,
देने का,
आँखों पर पट्टी बाँधकर
कूदने का।

वह
काँपता हुआ कदम—
आत्मविश्वास से नहीं,
ईमानदारी से—

यही सब कुछ है।

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