यह रासायनिक अस्तित्व
एक शब्द
कान से टकराता है—
और
पूरा शरीर
उथल-पुथल में आ जाता है।
एक शब्द,
और
तापमान बढ़ जाता है।
हृदय तेज़ हो जाता है।
श्वास बदल जाती है।
यह क्या है?
यदि
रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं,
तो
और क्या है?
यह देह
रसायनों का ढेर है।
इसमें
रासायनिक विचार उठते हैं।
रासायनिक भाव बहते हैं।
रासायनिक इच्छाएँ
आकर्षित करती हैं।
रासायनिक भय
सिकोड़ते हैं।
रासायनिक महत्वाकांक्षाएँ
दौड़ाती हैं।
रासायनिक प्रेम
आसक्ति बन जाता है।
रासायनिक मृत्यु
अंत का डर रचती है।
रासायनिक जीवन
अपने ही चक्र में घूमता है।
तो
होने दो।
देह को
रसायन बनने दो।
विचार
अपने रासायनिक नियमों से
चलें।
भावनाएँ
अपने हार्मोनल एजेंडे से
उठें-गिरें।
डर,
आशा,
वासना,
लगाव—
सब
अपनी रासायनिक मजबूरी में
कार्य करें।
मुझे
कोई आपत्ति नहीं।
पर एक प्रश्न है—
जो
रासायनिक है,
वह
अपने संघटन का
दास है।
तो फिर
मैं
उसका दास
क्यों बनूँ?
जो
अपने आप
उठता-गिरता है,
उसमें
मैं
क्यों उलझ जाऊँ?
रसायन
अपना काम करें।
देह
अपना खेल खेले।
मन
अपनी तरंगें रचे।
पर
मैं
यह सब
नहीं हूँ।
मैं
उसका साक्षी हूँ।
और
साक्षी
कभी
दास नहीं होता।
जिस क्षण
मैंने
यह देख लिया—
कि
सोच
रसायन है,
भाव
रसायन है,
डर
रसायन है,
प्रेम भी
रसायन है—
उसी क्षण
बंधन
ढीला पड़ गया।
क्योंकि
रसायन
मुझे बाँध नहीं सकते।
वे
बस
घटित होते हैं।
और
मैं
स्वतंत्र हूँ—
इसलिए नहीं
कि
रसायन रुक गए,
बल्कि इसलिए
कि
अब
मैं
उनसे
पहचान नहीं करता।
देह
रसायन रहे।
जीवन
रासायनिक नृत्य करे।
और मैं—
मैं
मुक्त रहूँ।





