बोध और अवबोध
बोध और अवबोध
जान लेना ही
देख लेना नहीं होता।
सूचनायें
आँख नहीं खोलती,
केवल स्मृति भरती है।
यही भ्रम
जीवन भर चलता रहता है।
तथ्य बताए गए,
पर भीतर कुछ नहीं हिला।
कहा गया—
यह ठीक है,
यह गलत है।
दिमाग ने
सहमति दे दी,
जीवन वैसा ही रहा
जस का तस।
आग का वर्णन
हाथ नहीं जलाता।
जब तक ताप
स्वयं को न छुए,
सावधानी
केवल एक विचार तक रहती है।
इच्छाएँ
बोध से नहीं टूटतीं।
वे तब ढीली पड़ती हैं
पर जब स्पष्ट दिख जाए
कि चोट
बाहर से नहीं,
भीतर से लग रही है
तब होता है
अवबोध का उदय।
उपदेश
आचरण नहीं बदल सकते।
स्पष्टता बदलती है
जहाँ भ्रम
टिक नहीं पाता,
फिर वहाँ
सुधार की ज़रूरत नहीं रहती।
नश्वरता
एक सिद्धांत नहीं,
एक सामना है।
जब सामना होता है,
अवबोध से
योजनाएँ
अपने-आप गिर जाती हैं।
नैतिकता
प्रयास माँगती है।
दृष्टि प्रयास की आवश्यकता
समाप्त कर देती है।
जो केवल जानता है,
वह बार-बार चूकता है।
जो देख लेता है,
वह लौट नहीं पाता।
बोध
व्यवहार को समझाता है।
अवबोध
व्यवहार को जन्म देता है।
इसीलिए
बस जानकारी के पुजारी
थके थके रहते हैं,
और स्पष्टता के उपासक
आज़ाद हो जाते हैं।
अंतर
यही है—
एक बोझ है,
दूसरा मुक्ति।





