दर्द के व्यापारी को देख लो
जिसे देखकर
तुम अपने दर्द से लड़ते हो,
जिसे पाकर
तुम थोड़ी देर जी लेने की हिम्मत जुटाते हो—
उसी दर्द का सौदागर
तुम्हारे सामने मुस्कुरा कर खड़ा है।
वह पहले
तुम्हारे भीतर एक कमी पैदा करता है,
फिर उसी कमी का इलाज बनकर आता है।
वह घाव देता है
और मरहम की कीमत तय करता है।
तुम्हारी बेचैनी
उसकी पूँजी है,
तुम्हारा डर
उसका व्यापार।
वह तुम्हें तोड़ता है
ताकि तुम
उसके सहारे खड़े हो सको।
वह कहता है—
“देखो, बिना मेरे तुम अधूरे हो।”
और तुम
खुद को पूरा करने के लिए
उसी के दरवाज़े पर
फिर से खड़े हो जाते हो।
दर्द यहाँ दुर्घटना नहीं,
योजना है।
कमज़ोरी यहाँ अभिशाप नहीं,
उत्पाद है।
और राहत—
केवल एक अस्थायी छूट,
जिससे अगला सौदा
और आसान हो जाए।
तुम लड़ते हो,
पर लड़ाई तुम्हारी नहीं।
हथियार भी उसके हैं,
नियम भी उसके।
तुम जीत भी जाओ
तो वह हारता नहीं—
क्योंकि जीत की परिभाषा
उसी ने लिखी है।
शायद आज़ादी
कुछ खरीद लेने में नहीं,
उस दर्द को पहचान लेने में है
जो जानबूझकर दिया गया।
क्योंकि
जिस दिन तुमने
दर्द के व्यापारी को देख लिया,
उस दिन
सौदा अपने आप टूटने लगता है।
✍️मनीभाई नवरत्न





