अब्र के दोहे

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अब्र के दोहे

मस्ताया मधुमास है, गजब दिखाए रंग।
फागुन बरसे टूटकर, उठता प्रीत तरंग।।

लाया फूल पलाश का, मस्त मगन मधुमास।
सेमल-सेमल हो गया, फागुन अबके खास।।

काया नश्वर है यहाँ, मत भूलें यह बात।
कर्म अमर रहता सदा, भाव जगे दिन रात।।

सार्वजनिक जीवन सदा, भेद भाव से दूर।
जिनका भी ऐसा रहा, वो जननायक शूर।।

होली में इस बार हम, करें नया कुछ खास।
नर नारी दोनों सधे, पगे प्रेम उल्लास।।

होंली के हुड़दंग में, रखें सदा यह याद।
अक्षुण्ण नारी मान हो, सम्मानित सम्वाद।।

धूम मचाएँ झूम के, ऐसा खेलें फाग।
जीवन में खुशियाँ घुले, पगे प्रेम अनुराग।।

हर्षित अम्बर है यहाँ, भू पुलकित है आज।
सतरंगे अहसास से,, उड़ी हुई है लाज।।

जपें नाम प्रभु राम का, इसका अटल विधान।
तारक ईश्वर हैं यही, सद्गति के सन्धान।।

    सम्यक ईश्वर की नजर, रचता रहे विधान।
सुख दुख दोनो ही दिये, माया जगत वितान।।

  निर्णय ईश्वर का हुआ, सदा बहुत ही नेक।
अज्ञानी समझे नहीं, समझा वही विवेक।।  

काव्य सुधा रस घोलती, समझ सृजन का मर्म ।
सम्बल हे माँ शारदे, अभिनन्दन कवि कर्म ।।  

वैचारिकता शून्य जब, यत्र तत्र हो तंत्र।
सकारात्मक सोच सदा, खुश जीवन का मंत्र।।

  गहरी काली रात में, सूझे नहीं उपाय ।
करें प्रात की वंदना, करता ईश सहाय ।।  

अहा अर्चना हम करें, नित्य प्रात के याम ।
भूधर का उत्तुंग शिखर , है भोले का धाम ।।  

वाणी संयम से मिले, सामाजिक सम्मान।
तोल मोल बोली सदा, रखे आपका मान।।  

नदियाँ ममता बाँटती, ज्यों माता व्यवहार।
पालन पोषण ये करे, गाँव शहर संसार।।  

सच जिंदा ईमान भी, लोगों को है आस।
आया जब भी फैसला, तब जीता विश्वास।।

कहे जनवरी नित्य ही, खोलो सारे बन्ध।
प्रेम दिसम्बर तक बढ़े, बिना किसी अनुबन्ध।।


राजेश पाण्डेय अब्र
   अम्बिकापुर


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