कविता बहार

हाइकु

सायली कैसे लिखें (How to write SAYLI)

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सायली रचना विधान : सायली कैसे लिखें उदाहरण*= इश्क मिटा गया बनी बनायी हस्ती बिखर गया आशियाँ.. *© शिरीष देशमुख* तुझे याद नहीं मैं वहीं बिखरा छोडा जहां तुने..  © शिरीष देशमुख

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महंगाई -विनोद सिल्ला

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 महंगाई महंगी  दालें  क्यों  रोज  रुलाती।सब्जी  दूर  खड़ी  मुंह  चढाती।। अब सलाद अय्याशी कहलाता है,महंगाई  में  टमाटर  नहीं भाता है,मिर्ची  बिन   खाए  मुंह  जलाती।। मिट्ठे फल ख्वाबों में  ही  आते  हैं,आमजन इन्हें नहीं खरीद पाते हैं,खरीदें  तो  नानी  याद  है आती।। कङवे करेलों के सब दर्शन करलो,आम अनार के फोटो सामने धरलो,सुनके  कीमत, भूख भाग

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चन्द्रयान 2 पर कविता -डी.राज सेठिया

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चन्द्रयान 2 पर कविता काबिलियत है,पर मार्ग कठिन बहुत है।हासिल कुछ नही ,पर पाया बहुत है। हाँ नींद भी बेची थी,पर सकून बहुत पाया था।हाँ चैन भी बेची थी,पर गर्व बहुत पाया था।। दुआएं थी सवा सौ करोड़ लोगों की,वह क्या कम था। इसरो मैं भी भावुक हुँ,क्योंकि मैंने भी दुआ मांगा था।। जीवन के

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विघ्न हरो गणराज-सुधा शर्मा

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विघ्न हरो गणराज हे गौरी नंदन हे गणपति,प्रथम पूज्य  महराज। कृपा करो हे नाथ हमारे,विघ्न हरें गण राज।। घना तिमिर है छाया जग में, भटक रहा इंसान।   भूल गया जीवन मूल्यों को ,बना हुआ शैतान।।  हे दुख भँजन आनंददाता,करिए  पूरी आस। रोग दोष सकल दूर करके,हरिए क्लेशविषाद ।। प्रथम पूजनीय हो प्रभू जी,पूजे सब संसार। 

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वे है मेरे गुरु जी-रोहित शर्मा ‘राही’

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भारत के गुरुकुल, परम्परा के प्रति समर्पित रहे हैं। वशिष्ठ, संदीपनि, धौम्य आदि के गुरुकुलों से राम, कृष्ण, सुदामा जैसे शिष्य देश को मिले। डॉ. राधाकृष्णन जैसे दार्शनिक शिक्षक ने गुरु की गरिमा को तब शीर्षस्थ स्थान सौंपा जब वे भारत जैसे महान् राष्ट्र के राष्ट्रपति बने। उनका जन्म दिवस ही शिक्षक दिवस के रूप

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गुरू ने ज्ञान का दीप जलाया -सुन्दर लाल डडसेना मधुर

हिंदी कविता

भारत के गुरुकुल, परम्परा के प्रति समर्पित रहे हैं। वशिष्ठ, संदीपनि, धौम्य आदि के गुरुकुलों से राम, कृष्ण, सुदामा जैसे शिष्य देश को मिले। डॉ. राधाकृष्णन जैसे दार्शनिक शिक्षक ने गुरु की गरिमा को तब शीर्षस्थ स्थान सौंपा जब वे भारत जैसे महान् राष्ट्र के राष्ट्रपति बने। उनका जन्म दिवस ही शिक्षक दिवस के रूप

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तीजा तिहार पर आधारित लोकगीत -माधुरी डडसेना

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तीजा तिहार पर आधारित लोकगीत  ठेठरी खुरमी धर के दीदी,तीजा मनाये बर आहे जी।गंहू के गुलगुल भजिया धरके,डोकरी दाई बर लाथे जी।।  दाई ददा के मयारू ह,   बेटी बनके आहे जी।बालपन के संगी जहूंरिया,  डेरउठी म रद्दा निहारे जी।।  बारा बजे गिंजर गिंजर के,  करुभात झेलावत है जी।होत बिहिनिया सजसंवर के,लुगरा ले बर जावत हे

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गणपति स्वागत है- माधुरी डडसेना

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गणपति स्वागत है पधारिये गिरजाशिव नन्दन, गणपति स्वागत है। बुद्धि प्रदाता हे दुख भंजन  सदा शुभागत है।। मुसक वाहन प्रखर प्रणेता,जग के नायक हो। प्रथम पुज्य तुम हो अग्रेता,  सुख के दायक हो विश्वासों का दीप जलाये,    हम शरणागत है। पधारिये गिरजा शिव नन्दन,   गणपति स्वागत है ।।  मात पिता में ब्रह्मण्ड बसा,   बतलाया जग

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mera bharat mahan

आगे परब झंडा के -बोधन राम निषादराज विनायक

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आगे परब झंडा के आगे परब झंडा के,दिन अगस्त मास म। चलो झंडा  लहराबो ,खुल्ला अगास म।। आगे परब झंडा के…………………. रंग केसरिया हे ,तियाग के  पहिचान के। खून घलो खौलिस हे,देश के जवान के।। आजादी मनावत हन,उंखरे परयास  म। आगे परब झंडा के,………………… चलो झंडा लहराबो…………………. सादा रंग शांति अउ,सुरक्छा बतावत हे। मया भरे

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बासुदेव अग्रवाल नमन – गणेश वंदना

हिंदी कविता

गणेश वंदना  मात पिता शिव पार्वती, कार्तिकेय गुरु भ्राता।पुत्र रत्न शुभ लाभ हैं, वैभव सकल प्रदाता।। रिद्धि सिद्धि के नाथ ये, गज-कर से मुख सोहे।काया बड़ी विशाल जो, भक्त जनों को मोहे।।  भाद्र शुक्ल की चौथ को, गणपति पूजे जाते।आशु बुद्धि संपन्न ये, मोदक प्रिय कहलाते।। अधिपति हैं जल-तत्त्व के, पीत वस्त्र के धारी।रक्त-पुष्प से सोहते, भव-भय

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jivan doha

जीवन के दोहों का संकलन

समाज और यथार्थ

जीवन के दोहों का संकलन 1- है मलीन चादर चढ़ी, अंतः चेतन अंग। समझे तब कैसे भला, हूँ मैं कौन मलंग।। 2- प्रतिसंवेदक कॄष्ण हैं, लिया पार्थ संज्ञान। साध्य विषय समझे तभी, हुआ विजय अभियान।। 3- मैं अनुनादी उम्र भर, अविचारी थे काज। जिस दिन प्रज्ञा लौ जली, समझे तब यह राज।। (मैं – अहंकार)

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धारा तीन सौ सत्तर पैतींस ए -डाँ. आदेश कुमार पंकज

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 धारा तीन सौ सत्तर पैतींस ए  सत्तर सालों में अब कोई नया उजाला लाया है । छप्पन इंची के सीने ने ही साहस दिखलाया है ।। बच्चों को बंदूकें देकर जहर घोलते फिरते थे । केसर की क्यारी जो जन आग लगाते फिरते थे ।। ऐसे सब गद्दारों को उनके घर में दफनाया है ।

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