कविता बहार

Jai Sri Ram kavitabahar

रामनवमी पर दोहे / सुधा शर्मा

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रामनवमी का त्यौहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है जो अप्रैल-मई में आता है। हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन मर्यादा-पुरूषोत्तम भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था। रामनवमी पर दोहे / सुधा शर्मा जनम लिए रघुनाथ हैं,हर्षित जन मन आज।आए जग भरतार हैं,रघुकुल के सरताज।। चैत्र शुक्ल तिथी नवम,शुभ दिन शुभ कर नाम।राजा दशरथ प्राण प्रिय,जनमे रघुवर […]

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राम नवमी शुभ घड़ी आई

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राम नवमी शुभ घड़ी आई राम नवमी  शुभ घड़ी आईअवध में जन्म लिये रघुराई ।।राम लक्ष्मण भरत शत्रुघनआये जगत पति त्रिभुवन तारण ।बाजत दशरथ आँगन शहनाईअवध में जन्म लिये रघुराई ।।सखियाँ मिलकर मंगल गातीजगमग जगमग दीप जलातीस्वर्ग से देवियाँ  फूल बरसाईअवध में जन्म लिये रघुराई ।।तीनों मैंया    पलना झुलावेमुखड़ा चूम चूम लाड लड़ा वेचँहुदिशि  गूँजे

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राधा की स्मृतियाँ

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राधा की स्मृतियाँ रतजगे हैं हमने कई किये…प्रतीक्षा में तुम्हारी हे प्राणप्रिये !प्रति स्पन्दन संग नाम तुम्हाराहम राधे-राधे जपा किये ।।१।।वो यमुना-तट का तरु-तमालथा विरह-स्वर में देता तालस्मृति संग लय भी बंधती रहीमम छंदों की अनुमति लिये ।।२।।कभी सांसें हमारी, कभी बांसुरी…प्रतीक्षारत् सदा से नयन-पांखुरीस्मृतियाँ क्षण-क्षण रुलातीं-हँसातींतुम्हें कैसे बतायें ? हैं कैसे जीये ? ।।३।।न

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कैसे कह दूं कि मुझे तुमसे प्यार हुआ नहीं

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कैसे कह दूं कि मुझे तुमसे प्यार हुआ नहीं   सबको कई बार होता मुझे एक बार हुआ नहीं , तुम्हें देखने को ये दिल भी बेकरार हुआ नहीं, कोशिश बहुत की इस कम्बख्त दिल ने मगर , फिर भी मुझसे इश्क का इज़हार हुआ नहीं , मेरी नजरें मिली नहीं तुम्हारी नजरों से ज़रा भी

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हिन्दू नववर्ष ( चैत्र नवरात्र ) पर कविता

समाज और यथार्थ

चैत्र हिंदू पंचांग का पहला मास है। इसी महीने से भारतीय नववर्ष आरम्भ होता है। हिंदू वर्ष का पहला मास होने के कारण चैत्र की बहुत ही अधिक महता है। अनेक पर्व इस मास में मनाये जाते हैं। चैत्र मास की पूर्णिमा, चित्रा नक्षत्र में होती है इसी कारण इसका महीने का नाम चैत्र पड़ा।

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बेटी पर दोहे -सुकमोती चौहान

समाज और यथार्थ

बेटी पर दोहे -सुकमोती चौहान १.बेटी होती लाड़ली,जैसे पुष्पित बाग।बिन बेटी के घर लगे, रंग चंग बिन फाग।। २.बेटी लक्ष्मी गेह की,अब तो नर लो मान।सेवा कर माँ बाप की,बनती कुल की शान।। ३.साक्षर होगी बेटियाँ,उन्नत होगा देशभर संस्कार समाज में,बदलेंगी परिवेश।। ४.बहु भी बेटी होत है,रखो न दूजा भावनिज बेटी सा मान दो,लाओ जी

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शानदार पार्टी

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शानदार पार्टी चल रही थी खूब,अमीर दिलदार लोगों की पार्टी ,जहां शामिल होने के लिए ,किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं ,और ना ही आवश्यकता है,निश्चित राशि की।बस एक मुस्कान के साथ कह दो ,मुझे भी शामिल करोगे यार।मां ने बस दस रुपए दिए हैं ,एक साथ आवाज आई ,“आ जाओ!”पैसे की भी जरूरत नहीं ,पूरी

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सद्गुरु-महिमा न्यारी जग का भेद खोल दे

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सद्गुरु-महिमा न्यारी सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे।वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।।गुरु से प्राप्त की शिक्षा, संशय दूर भागते।पाये जो गुरु से दीक्षा, उसके भाग्य जागते।।गुरु-चरण को धोके, करो रोज उपासना।ध्यान में उनके खोकेेे, त्यागो समस्त वासना।।गुरु-द्रोही नहीं होना, गुरु आज्ञा न टालना।गुरु-विश्वास का खोना, जग-सन्ताप पालना।।गुरु की गरिमा भारी,

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अर्ज़ी कर लेना तुम स्वीकार ओ मैया

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अर्ज़ी कर लेना तुम स्वीकार ओ मैया मेरी अर्ज़ी कर लेना, अब तो तुम स्वीकार ओ मैयाइस बेटी को दे देना, अपना थोड़ा प्यार ओ मैयामैं तो तेरा नाम जपूँ, चाहे रूठे संसारमेरी अर्ज़ी……हे सुखकर्णी हे दुखहरणी मैया शेर सवारीसकल विश्व गुणगान करे माँ तेरी महिमा न्यारीकल कल बहती निर्मल गंगा अम्बे शरण तिहारीजगमग जगमग

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रोज ही देखता हूँ सूरज को ढलते हुए

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रोज ही देखता हूँ सूरज को ढलते हुए दरख्त रोज ही देखता हूँसूरज को ढलते हुए!फिर अगली सुबह ,निकल आता है मुस्कुराकर!नयी उम्मीद और विश्वास लिए,मेरे पास अब उम्मीद भी नहीं बचीमेरे सारे पत्तों की तरह!सपने टूटने लगते हैंजब देखता हूँकुल्हाड़ी लिये,बढ़ रहा है कोई मेरी ओर..मैं लाचार…विवश…उसे रोक नहीं सकताक्योंकि–उस इंसान की तरह ही

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बसन्त और पलाश

प्रकृति और पर्यावरण

बसन्त और पलाश दहके झूम पलाश सब, रतनारे हों आज।मानो खेलन फाग को, आया है ऋतुराज।आया है ऋतुराज, चाव में मोद मनाता।संग खेलने फाग, वधू सी प्रकृति सजाता।लता वृक्ष सब आज, नये पल्लव पा महके।लख बसन्त का साज, हृदय रसिकों के दहके।।शाखा सब कचनार की, लगती कंटक जाल।फागुन की मनुहार में, हुई फूल के लाल।हुई

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तुम्हारे प्यार में कब-कब बिखरा नहीं हूँ मैं

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तुम्हारे प्यार में कब-कब बिखरा नहीं हूँ मैं नैनों की झील में इश्क़ का पतवार लियेकौन कहता है कि कभी उतरा नहीं हूँ मैं ?बिखरा तो बहुत हूँ ज़िंदगी के जद्दोजहद मेंतुम्हारे प्यार में कब-कब बिखरा नहीं हूँ मैं ?तब मेरे बालों पे उंगलियाँ क्या फेर दीं तुमनेउस आइने से पूछिए कब से संवरा नहीं

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